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स्वामीनाथन की सिफ़ारिशों के बजाय कृषि आशीर्वाद योजना का झुनझुना

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स्वामीनाथन की सिफ़ारिशों कि जगह भाजपा के पिटारे में कृषि आशीर्वाद योजना का झुनझुना

भाजपा सरकार ग़रीब किसानों को शोकेस या विज्ञापन की तरह इस्तेमाल करके धनी किसानों की राजनीति कर रही है। ग़रीब किसानों के कन्धों पर बेताल की तरह लटक कर ग़रीब किसानों के तथाकथित हितैषी कहलाते हुए उन्हें श्मशान के उसी ख़ौफ़नाक अँधेरे में फाँसकर कैसे रखा जाए भली भांति जानते हैं। शायद यही वजह है कि सरकार इस दफा इन्हें तार्किक बातों से सहमत करने की बजाय भावना व चंद सिक्कों का क्लोरोफ़ॉर्म सुँघाकर अपनी चुनावी राजनीति साध लेना चाहती है?

कुछ ही दिन पहले पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई, समय पर फ़सल के दाम देने, स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें लागू कराने, क़र्ज़ माफ़ी, सस्ता बिजली-पानी जैसी 21 सूत्रीय माँग-पत्रक के साथ भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में हज़ारों के काफ़िले में किसान दिल्ली आये थे। 2 अक्टूबर के दिन दिल्ली में प्रवेश करते समय सरकार ने इन किसानों पर आँसू गैस के गोले दागे, लाठियाँ भांजी व इनपर रबर की गोलियां तक छोड़ी थीं। कई मुश्किलातों को पार कर इन किसानों ने देर रात किसान घाट तक पहुंचे थे।

ग़रीब किसानों के हालात देश के भीतर वाक़ई बदतर हैं। 30 दिसम्बर 2016 को जारी की गयी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (‘एनसीआरबी’) के आँकड़ों के अनुसार साल 2015 में कुल 12,602 किसानों और खेत मज़दूरों ने आत्महत्याएँ की थीं। अपनी जान देने वालों में 7,114 ख़ुदकश्त किसान, 893 पट्टे पर ज़मीन लेकर खेती करने वाले किसान और 4,595 खेत मज़दूर शामिल थे। जबकि 2018 के आँकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार के चार साल के शासन काल में 50 हज़ार से ज़्यादा किसान व खेत मज़दूरों ने  आत्महत्या की।

प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना के अंतर्गत ग़रीब किसानों का ज़बरदस्ती बीमा किया गया तथा नुक़सान के समय बीमें से बहुत कम बीमा राशि का भुगतान किया गया। विगत दो वर्षों में ही कंपनियों को 36,848 करोड़ रुपये ज़्यादा प्रीमियम प्राप्त हुआ, मतलब लोगों की जेबों से निकला आय का हिस्सा सीधा कंपनियों की जेब में डाला दिया गया। इससे यह साफ़ हो गया कि भाजपा सरकार में कृषि की स्थिति भी पूँजीवाद के आम नियमों से स्वतंत्र नहीं है। इसमें भी बड़ी पूँजी छोटी पूँजी को तबाह-बर्बाद करती दिखी है।

बहरहाल, चूँकि आने वाले समय में झारखंड में विधानसभा चुनाव हैं। तो जाहिर है ऐसे हालत में आज के अस्मितावादी और पहचान की राजनीति के दौरे-दौरा में किसान पहचान को महिमामण्डित करने वाले व ग़रीब किसानों के स्वघोषित हितैषी भाजपा को इन किसानों के वोट चाहिए। वोट बटोरने के मामले में भाजपा कहाँ पीछे रहती है, भले वह मुकम्मल न हो लेकिन हर मौके के लिए उनके पास योजनायें होती है। इस बार भी स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के बजाय “कृषि आशीर्वाद योजना” के मुखौटे के साथ झारखंडी जनता के समक्ष प्रस्तुत हैं।

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