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वीवीपैट को EVM के साथ जोड़ चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित क्यों नहीं की जा सकती

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उच्चतम न्यायालय के पूछे गये सवाल कि सभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ वीवीपैट की व्यवस्था करके चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित क्यों नहीं की जा सकती है? इस बाबत चुनाव आयोग जवाब देने के बजाय उच्चतम न्यायालय दूसरा सवाल पूछ बैठा कि क्या उसे ईवीएम पर भरोसा नहीं है! सवाल है कि यह कैसा जवाब है? चुनाव आयोग सभी ईवीएम मशीनों के साथ चुनावों में वीवीपैट की व्यवस्था करने से घबरा क्यों रहा है? क्या इसके पीछे कोई साज़िश तो नहीं? इस सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

जब हालिया विधानसभा चुनावों में ही ईवीएम मशीनें सड़क पर पड़ी मिल रही थीं, भाजपा नेताओं के घर से बरामद हो रही थीं, जहाँ ईवीएम मशीनें रखी गयी थीं, वहाँ अचानक लाइट चली जा रही थी और सीसीटीवी कैमरे बन्द हो जा रहे थे, तो क्या यह शक लाज़िमी नहीं है कि भाजपा सरकार ईवीएम घोटाला करने पर आमादा है? इस चुनाव में पहले चरण का मतदान ही हुआ था और एक ही दिन में देश भर से ईवीएम मशीनों में ख़राबी की ख़बरें पूरे देश से आ गयीं। सहारनपुर में ही क़रीब 56 मशीनें ख़राब होने की शिकायत के बाद उन्हें बदला गया। चुनाव आयोग के अनुसार ही क़रीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा ख़राब मशीनों की ख़बरें आयीं। आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री चन्द्रबाबू नायडू ने तो कहा कि 30 प्रतिशत ईवीएम सही काम नहीं कर रही हैं।

बाहरहाल, पहले चरण के मतदान में ही साफ़़ हो गया कि इन ईवीएम मशीनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि हर चुनाव में हर राज्य में जो भी ईवीएम मशीनें गड़बड़ पायी गयी हैं, सबमें हमेशा एक ही तरह की ख़राबी आती है – बटन किसी भी पार्टी का दबाओ मगर वोट भाजपा को जाता है। पहले चरण के मतदान में एक वोटर ने तो बाक़ायदा वीडियो बनाकर फ़ेसबुक पर पोस्ट किया कि किसी अन्य पार्टी के आगे का बटन दबाने के बावजूद भाजपा को वोट जा रहा है। क्या अब भी सुप्रीम कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर इस मुद्दे पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? क्या चुनाव आयोग को पहले चरण के अनुभव के बाद स्वयं ही सभी ईवीएम के वीवीपैट वेरिफि़केशन की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए? लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसका हश्र भी जज लोया जैसा हो।

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