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केचुआ नाम को सार्थक करता केन्द्रीय चुनाव आयोग

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जनता द्वारा दिए नाम केचुआ को सार्थक करता चुनाव आयोग

भारत के अबतक इतिहास में कभी भी चुनाव आयोग की ऐसी गयी-बीती हालत नहीं रही है। फ़ासीवाद की कई ख़ासियतों में से एक यह भी है कि यह तमाम “सम्मानित संस्थाओं” को अंदर से खोखला बना देता है। पहले तो कम से कम अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए ये संस्थाएँ कुछ क़दम उठाया करती थीं, लेकिन अब मानो ये भाजपा और नरेन्द्र मोदी के इशारों पर नहीं बल्कि उसकी कोई मोर्चा  के तौर पर काम करती दिखती हैं। भाजपा के नेता एक तरफ़ खुले तौर पर चुनावी रैलियों में भारतीय सेना को ‘मोदी की सेना’ बता रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग शर्माते-शर्माते बस ‘चेतावनी’ देकर रह जा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने टीवी पर साफ़ झूठ बोला कि उनको इस नमो चैनल की कोई जानकारी नहीं है, जबकि उनके ट्विटर अकाउण्ट से रोज़ इस चैनल का प्रचार किया जा रहा था। बाद में भाजपा ने बेशर्मी से स्वीकार किया कि उसका आईटी सेल ही इस चैनल को चला रहा था, लेकिन फिर भी उसमें चुनाव आयोग को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखता।

नरेन्द्र मोदी के जीवन पर बनी फ़िल्म का धड़ल्ले से प्रचार हो रहा था और उन पर एक वेब सीरीज़ का प्रसारण भी किया जा रहा था। काफ़ी हंगामे और अनेक वरिष्ठ रिटायर्ड अफ़सरों के एक खुले पत्र के बाद मजबूरन ‘केचुआ’ को नमो टीवी और मोदी फ़िल्म पर रोक लगाने का आदेश देना पड़ा। हालाँकि कई जगहों से लोगों का कहना है कि क़ानूनी रोक के बावजूद नमो टीवी दिखाया जा रहा है। वेब सीरीज़ का प्रसारण अब भी जारी है। सारे क़ानूनों और नियमों को ताक पर रखकर हार के डर से परेशान भाजपा और संघ परिवार चुनाव की आचार संहिता की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग शान्त है। ऐसे में, इस संस्था की तथाकथित निष्पक्षता की सच्चाई जनता के सामने आ गयी है। यही नहीं मोदी, अमित शाह और योगी सहित भाजपा के अनेक नेता झूठे, साम्प्रदायिक और अपमानजनक बयान धड़ल्ले से देते रहे, लेकिन चुनाव आयोग के कान पर जूँ नहीं रेंग रही। हालांकि  सुप्रीम कोर्ट के सख़्ती के बाद केचुआ जी ने योगी, मेनका गाँधी, आज़म खाँ और मायावती के चुनाव प्रचार पर तीन दिन की रोक लगायी। लेकिन फिर भी मोदीजी के खुलेआम सेना के नाम पर वोट माँगने और हिन्दू-मुस्लिम करने के बावजूद केचुआ की उस पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही है।

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