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झारखंड मुक्ति मोर्चा के आन्दोलन का परिणाम है अलग झारखंड

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झारखंड मुक्ति मोर्चा के शंघर्ष से भरे आन्दोलन का परिणाम है अलग झारखंड

शिबू सौरेन ने बिनोद बाबू के निधन के तुरंत बाद ही 27-28 जनवरी 1992 को धनबाद सराइढेला में रखे झामुमो केन्द्रीय समिति बैठक में, यह तय हुआ कि राँची मोराबादी मैदान से 15 मार्च को एक विशाल रैली निकाली जायेगी जिसका नाम शहीद रैली होगा। उस बैठक में यह तय हुआ कि सभी सदस्य अपने क्षेत्र के महान शहीदों के नाम की ज्योती, मशाल व बैनर लेकर पहुँचेंगे। मोराबादी मैदान में यह शहीद ज्योती जलाई जायेगी और यह ज्योती तब तक जलती रहेगी, जबतक झारखंड राज्य अलग नहीं हो जाता।

उस बैठक में यह भी फैसला लिया गया था कि दिनांक 21 मार्च को सम्पूर्ण झारखंड बन्द रहेगा और दिनांक 22 मार्च से 3 अप्रेल कुल तेरह दिन झारखंड में आर्थिक नाकेबन्दी रहेगी। इस आर्थिक नाकेबन्दी के तहत इस राज्य के खनिज पदार्थ, लकड़ी, सीमेंट आदि तमाम वस्तुओं को झारखण्ड से बाहर ले जाने पर रोक होगी। जो भी वार्त्ता होगी, दिल्ली में नहीं बल्कि झारखंड की धरती पर होगी। 15 मार्च को राँची के मोराबादी मैदान में ऐतिहासिक भीड़ जुटी, शहीद ज्योती जलाई गई। 21 मार्च से बंदी शुरू हुआ। झारखण्ड के आन्दोलन के इतिहास में ऐसा आन्दोलन अब तक नहीं हुआ था। सारे खनिज पदार्थो की नाकेबन्दी कर दी गई थी। ट्रकों का आवागमन, रेल गाड़ियां, खासकर मालगाड़ियों का चलना बन्द करा दिया गया। पूरे झारखंड के खदानों से खनिज की ढुलाई बंद हो गई, बालू, लकड़ी, सीमेंट तक की ढुलाई बंद रही। कोयला ढुलाई तो संपूर्ण रूप से बाधित रही। एक विचित्र सन्नाटा छा गया था झारखण्ड में।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के इस आन्दोलन में झारखंड की जनता के साथ- साथ अन्य दलों नें इसका समर्थन किया। इस दौरान हजारों कार्यकर्त्ताओं ने गिरफ्तारी दी। कई जगहों पर तोड़-फोड़, बमबाजी की घटनाएँ भी हुई। लाठीचार्ज हुए। पर यह आन्दोलन रूका नही और इसने एक जन आन्दोलन का रूप ले लिया। मसलन, इन गलियारों से हमारे लिए हमारे दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने झारखंड निकाल कर लाये हैं, ऐसे ही इन्हें युग पुरुष नहीं कहा जाता है। जिस लडाई को इन्होंने छेड़ा था उसे मुकाम तक पहुँचाया इसलिए जब फासीवादी पूछते हैं कि इन्होंने क्या किया तो एक झारखंडी कलमकार को बहुत दुःख होता है।

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