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एनडीए की सरकार पर देश के ग्रामीण जनता को यकीन नहीं

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एनडीए के चौकीदार अम्बानी-अडानी के पैसों के बूते हेलीकॉप्टरों में घूम घूम कर इस बार भी सभा करनी शुरू कर चुके हैं। हालांकि अब तो उनके सभाओं में पैसे दे-देकर भीड़ जुटाने के बावजूद आधी कुर्सियाँ ख़ाली ही पड़ी रह जा रही हैं। यही कारण है कि मोदी ज़्यादा चीख़-चिल्ला रहे हैं! स्थिति यह  है कि चुनाव भारत का है, लेकिन वे वोट पाकिस्तान के नाम पर माँग रहे हैं! हिन्दू-मुसलमान, मन्दिर-मस्जिद, आदि सब पर बात हो रही है, लेकिन ‘अच्छे दिनों’ व वास्तविक उपलब्धि की वे बात तक नहीं कर रहे। अमेरिका द्वारा यह बताये जाने के बावजूद कि भारत ने पाकिस्तान का कोई एफ़-16 लड़ाकू विमान नहीं गिराया है के बावजूद चौकीदार व उनकी सरकार बेशर्मी से बालाकोट हमले की बातें कर रहे हैं। वैसे भी ये भारत के पहले ऐसे प्रधानमन्त्री हैं जो बिना किसी लज्जा के चीख़-चीख़ कर झूठ बोलते हैं!

जिस नोटबन्दी के बारे में रो-रो कर दावा किया गया था कि इससे काला धन समाप्त हो जाएगा, न ही उसके बारे में साहेब एक शब्द बोलते हैं और न ही जीएसटी के अंतर्गत कर प्रणाली को न्यायपूर्ण बनाने के अपने दावे के बारे में ही मुँह से कोई शब्द निकल रहे। रोज़गार के वायदे तो दूर की कौड़ी ठहरी। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना युक्ति संगत होगा कि चौकीदार देश को चलने में पूरी तरह से फेल रहे और अब आम लोगों को धर्म और अन्धराष्ट्रवाद की अफ़ीम सुंघाकर बेवकूफ़ बनाने का प्रयास कर रहे है?

बहरहाल, एनडीए की सरकार पिछले पांच साल के कार्यकाल में देश की जनता की उम्‍मीदों पर कितनी खरी उतरी है इसका बयां एडीआर का सर्वे रिपोर्ट (ADR Report) ने पहले ही कर दी है। भारत की 44.21 फीसदी ग्रामीण जनता की प्राथमिकता में बेहतर रोजगार के अवसर सर्वोच्‍च हैं जिसपर यह सरकार खरी नहीं उतरती। उसके बाद के पांच मुद्दे कृषि से जुड़े हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं के लिए सिंचाई, कृषि ऋण, कृषि उत्‍पादों पर अधिकतम मूल्‍य, खाद और बीज पर सब्‍स‍िडी तथा कृषि कार्य के लिए बिजली की उपलब्‍धता उनकी प्राथमिकता में शामिल है। जबकि ग्रामीण मतदाताओं की प्राथमिकताओं में मजबूत सैन्‍य शक्‍ति, आतंकवाद जैसे मुद्दे सबसे नीचले पायदान पर हैं।

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