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संघ विचारधारा के केवल अक्स भर हैं नरेंद्र मोदी

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सर-संघ-चालक गोलवलकर ने किताबों में हिटलर की भूरी-भूरी प्रशंसा की है 

नरेंद्र मोदी का उभार सिर्फ एक व्यक्ति का उभार नहीं है बल्कि आर्थिक संकट में फंसी अर्थव्यवस्था के बीच फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उभार है। अगर हम यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने में गलती करते हैं तो हमारा हश्र भी वही होगा जो मुसोलिनी और हिटलर के दौर जर्मनी और इटली का हुआ था। आज संघ खुद को एक सांस्कृतिक, “सच्चे देशभक्तों” का संगठन बताता, लेकिन सवाल है कि इनके राष्ट्र की परिभाषा क्या है और उनकी शाखाओं में प्रचलित “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” से क्या साफ़ होता है?

संघ के लोकप्रिय सरसंघचालक गोलवलकर ने अपनी पुस्तकों ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ और ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में स्पष्ट शब्दों में इटली के फासीवाद और जर्मनी के नात्सीवाद की हिमायत किया है। हिटलर का भूरि-भूरि प्रशंसा करते उनका यह लिखना कि हिन्दुस्तान में भी हिन्दू जाति की शुद्धता की हिफ़ाज़त के लिए हिटलर के तरीकों को अपना ‘अन्तिम समाधान’ करना होगा, यही तो दर्शाता है। संघ का सांगठनिक ढांचा मुसोलिनी और हिटलर की पार्टी से हूबहू मेल खाना व जनतंत्र के कट्टर विरोधी फ़ासीवादी नेता मुसोलिनी के समान तानाशाही होना भी इसी और इशारा करता है।

 “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” में इनके द्वारा केवल हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज की ही रक्षा की बात करना स्पष्ट करता है कि धर्मनिरपेक्षता और जनवाद में इनका दूर-दूर तक कोई यक़ीन नहीं है। जबकि हिन्दू समाज को लेकर भी इनकी अपनी परिभाषा है। हिन्दुओं से इनका मतलब ‘मनुस्मृति’, मुख्य और मूल रूप से उच्च जाति के पुरुषों से होता हैं, जिसे ये अपना संविधान मान भारत में लागू करना चाहते हैं। मसलन, आर.एस.एस. का ढाँचा लम्बे समय तक “हिन्दू राष्ट्र” की सदस्यता उच्च वर्ण के हिन्दू पुरुषों के लिए ही खुली है; बाकियों यानी, ओबीसी, मुसलमान, ईसाई, दलित, स्त्रियों आदि के लिए दोयम दर्जे की स्थिति है।

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