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पर्यावरण झारखंड

अब मान लेना चाहिए, झारखंडी हितों की रक्षा कोई झारखंडी ही कर सकता है

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साल 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रसारित रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण व ज़हरीली हवा के कारण झारखंड समेत देश भर में तक़रीबन एक लाख बच्चों की मौत हुई, और दुनिया में छह लाख। भली भांति समझा जा सकता है कि यह बच्चे ज़्यादातर ग़रीबों के थे। झारखंड में गिरिडीह सरीखे जिलों-प्रमंडलों में पूंजीपति तमाम पर्यावरण नियमों को ताक पर रखते हुए आम आवाम-ग़रीबों की बस्तियों में उनकी ज़मीन सरकार की मदद से लूट लेते हैं। जहाँ वे बे रोक-टोक खतरनाक गैसों, अम्लों व धुएँ का उत्सर्जन करते हैं।  

आज विज्ञान के पास वह तमाम तकनीकें, जैसे एसिड को बेअसर करने, कणिका तत्वों को माइक्रो फ़िल्टर से छानने, मौजूद हैं, लेकिन मुनाफ़े की अंधी हवस में यह कम्पनियाँ यहाँ लोगों की जिंदगी से खेलते हुए न सिर्फ पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करती दिखती हैं, बल्कि मौजूदा सरकार में तो, अधिकारियों को अपनी जेब में रखकर मनमाने ढंग से पर्यावरण नियमों को बेशर्मी से कमज़ोर कर वहां कि जनता को उन्हीं की ज़मीनों में गाड़ देंगे कहते दिखती हैं।

झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र. में अडानी के पॉवर व अन्य प्रोजेक्टों के लिए वन कानूनों को तोड़ते-मरोते हुए भाजपा सरकार ने जंगल व उपजाऊ ज़मीन उन्हें सौंप दिए व पतंजलि के लिए भी पर्यावरण नियमों की धज्जियाँ ठीक वैसे ही उड़ायी गयीं, जैसे नियामगिरि, तूतीकोरिन, बस्तर, दंतेवाड़ा में वेदांता के लिए वहाँ की मयस्सर आबोहवा में ज़हर घोल दिया गया। ऐसे में एक साल में एक लाख बच्चों का वायु प्रदूषण की वजह से दम तोड़ देना कोई आश्चर्य की बात नहीं, आक्रोश की बात जरूर हो सकती है।

ऐसे में झारखंड के आदिवासी समाज से निकले हुए नेता, हेमंत सोरेन कहते हैं कि, इस सरकार ने केवल सत्ता व फंड-कमीशन के लोभ में, झारखंड की जल-जंगल-ज़मीन लूटा कर न केवल आज की बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों तक के भविष्य को अधर में लटका दिया है। आगे वे कहते हैं यह ज़मीन हमारे पूर्वजों द्वारा हमें सौंपी गयी धरोहर है, अभी तुम गाड़ दो हम गड़ जायेंगे लेकिन बिना लड़े तो नहीं जाएँगे। जल-वायु परिवर्तन के बीच हमारी भविष्य को ध्यान में रखते हुए विकास रेखा के लिए आख़िरी सांस तक लड़ेंगे, ताकि हमारा आज के साथ -साथ कल भी सुरक्षित रहे।

मसलन, यह कटु सत्य है कि पर्यावरण का सवाल सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। लेकिन जबतक उत्पादन का उद्देश्य जनता की ज़रूरत न होकर मुनाफा होगा और पूँजीपति मुनाफ़े की हवस में मनुष्य के साथ ही प्रकृति को निचोड़ती रहेगी तब तक धरती के पर्यावरण को बचाना मुश्किल है। और जबतक जनता के हाथ में उत्पादन के हर साधन का नियंत्रण नहीं आएगा, तबतक इसी तरह लाखों बच्चे भी मरते रहेंगे। इसके लिए ज़रूरी है पूँजीपतियों द्वारा वित्त-पोषित सरकार को उखाड़ फेकना, ताकि हमारे आने वाले बच्चे यहाँ की हवा में सांस ले सके।

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