Breaking News
Home / News / National / आँगनवाड़ी और आशाकर्मी बहनों को इस बजट में भी मिले केवल झूठे वादे
आँगनवाड़ी

आँगनवाड़ी और आशाकर्मी बहनों को इस बजट में भी मिले केवल झूठे वादे

Spread the love

वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने जो यूनियन बजट पेश किया वह बजट कम और चुनावी घोषणा-पत्र अधिक है। अंतिम बार भी केवल जुमलों की ही बौछार हुई। और इनके झूठ के इन गोलों को फ़रेब की चाशनी में डुबो कर और धोखे के थाल में सजाकर सच की तरह पेश करने के लिए आईटी सेल के ट्रोल और तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया तो है ही। मोदी सरकार ने दावा किया कि महिला और बाल विकास विभाग का बजट पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत बढ़ा दिया गया है। ज़ाहिर है कि भाजपा आने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र आँगनवाड़ी की लाखों कर्मचारियों व उनके परिवारों को येन-केन-प्रकारेन बरगलाये रखने में ही अपनी भलाई समझती है! परन्तु बजट का विश्लेषण करने पर इनकी असल मंशा बेपर्दा हो जाती है।

पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत राशि ज़्यादा आवंटित करने की असलियत यह है कि पिछले साल के बजट में इस विभाग को 24,700 करोड़ रुपये दिये गये थे और राष्ट्रीय पोषण मिशन के फ़ण्ड में तीन-चौथाई का इज़ाफ़ा किया गया था। जिसका नतीजा यह रहा कि झारखण्ड, जहाँ ‘पोषण माह’ मनाया जा रहा था वहां 4 महीनों से आँगनवाड़ी केन्द्रों पर पोषाहार ही नहीं पहुँचा था। वहीं दिल्ली, प्रधानमंत्री के शहर में भूख के कारण 3 बच्चियों का दम तोड़ देना उन 24,700 करोड़ रुपयों पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है।

अंतिम वित्तीय वर्ष में महिला एवं बाल विकास विभाग को 29,165 करोड़ रुपये आवंटित की गयी है। लेकिन पिछले प्रवृत्ति को देखें तो यह पता चलता है जितनी राशि आवंटित की जाती है उतनी कभी ख़र्च नहीं की जाती। जैसे 2012-17 में आँगनवाड़ी परियोजनाओं के लिए 1,23,580 करोड़ रुपये की राशि को स्वीकृति दी गयी थी, लेकिन ख़र्च केवल 78,768 करोड़ रुपये ही हुए, जो स्वीकृत राशि का 64 प्रतिशत है। 2016-17 के वित्तीय वर्ष में 30,025 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए जबकि ख़र्च केवल 14,561 करोड़ हुए, यानी केवल 48 प्रतिशत! उसमे भी अधिकांश बिना पारदर्शिता के एनजीओ-नेताशाही-नौकरशाही की भेंट चढ़ जाता है!

वैश्विक भूख सूचकांक (वर्ल्ड हंगर इंडेक्स) की रिपोर्ट कहती है कि भारत 119 देशों की सूची में 103वें स्थान पर पहुँच गया है। और देश की हालत अफ्रीका के पिछड़े देशों से भी ख़राब हैं। साथ-साथ ही जारी मानवीय विकास सूचकांक (ह्यूमन डिवेलप्मेंट इंडेक्स) की 189 देशों की सूची में भारत 130वें स्थान पर आ चुका है। भाजपा कौन से फार्मूले के तहत देश को विश्वगुरु बना रही  है जिसमे धन-धान्य से सम्पन्न यह देश गर्त में जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में 8 लाख बच्चों की मौत कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के कमी में हो गयी जो कि दुनिया में सबसे ज़्यादा है! जिस धरती पर हर 2 मिनट में 3 नौनिहालों की मौत कुपोषण के कारण हो जाती हो और जुमलेबाजों को शर्म तक न आती हो तो हालत की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता  है।

बहरहाल, भारत जैसा देश जो ‘कुपोषण’ की ज़बरदस्त मार झेल रहा है, वहाँ ‘समेकित बाल विकास परियोजना’ स्कीम में काम कर रही आँगनवाड़ी व आशाकर्मियों को कर्मचारी का दर्जा देने की सरकार की कोई मंशा ही नहीं दिखती है, जबकि इनका काम स्थायी प्रकृति का होता है। सरकार आँगनवाड़ी और आशा स्कीम के तहत कार्यरत सभी सहायिकाओं और कार्यकर्ताओं को पक्का करने की बजाय मानदेय बढ़ोत्तरी के झूठे झुनझुने थमा रही है! ज़ाहिर है, हर साल की तरह इस बार भी बजट का अधिकाँश हिस्सा नेताशाही-नौकरशाही और एनजीओ के चढ़ावे में चढ़ेगा और आम जनता तक भद्दे मज़ाक़ के अलावा कुछ नहीं पहुँचेगा!

  • 73
    Shares

Check Also

संथाल किंग शिबू सोरेन

संथाल नवोदय को गुरूजी ने गठा, बाद में वह आदिवासी सुधार समिति कहलाया -4

Spread the love‘ज़िंदगी तल्ख़ सही लेकिन दिल से लगाए रखना’ – संथाल किंग गुरूजी -भाग …

सरकारी स्कूलों की स्थिति

सरकारी स्कूलों को मर्जर के नाम पर बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी

Spread the loveसरकारी स्कूलों को मर्जर के नाम पर आखिर बंद करने की जरूरत क्यों …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: