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गिरिडीह में प्रदूषण की स्थिति

प्रदूषण को लेकर गिरिडीह सांसद-विधायक कुम्भकर्णी नींद में क्यों सोये रहे

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प्रदूषण देश की भीषण समस्या 

विज्ञान को मानवता का सेवक माना जाता है परन्तु मौजूदा सरकार और उनके चहेते पूंजीपति दोस्तों ने मुनाफ़ा तले इसे खुद का  बंधक बना रख दिया है। पूंजीवाद के नुमाइन्दगी करने वाली इस मानवद्रोही व्यवस्था ने न केवल मानवीय मूल्यों को, अपितु मानवीय संवेदनाओं को भी निगल लिया है। दुनियाभर के वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के ख़तरे और उसके प्रलयंकारी परिणामों को लेकर हमें एवं सरकार को लगातार आगाह कराती रहती है। अन्तर-सरकारी पैनल’ (आईपीसीसी) द्वारा जलवायु परिवर्तन पर 8 अक्टूबर को जारी किये गए रिपोर्ट में यह चेतावनी दी थी कि पृथ्वी का पारिस्थितिक तन्त्र इतना बिगड़ गया है कि लोग अपने तबाही का मंजर अपने ही जीवनकाल में देख सकेंगे। रिपोर्ट यह दावा करता है कि यदि वर्ष 2030 तक पृथ्वी के तापमान की वृद्धि को औद्योगिक क्रान्ति से पहले के तापमान की तुलना में 1.5 प्रतिशत तक सीमित न किया गया तो पृथ्वी पर मनुष्य सहित तमाम जीवों के अस्तित्व को बचाने में बहुत देर हो चुकी होगी।

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट को लेकर हमारे देश में न तो मोदी सरकार चिंतित है और न ही रघुबर सरकार सरीखे अन्य राज्यों की सरकार। एक तरफ तो यह भाजपा सरकार तकरीबन 11 लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से से बेदख़ल कर अपने पूंजीपति मित्रों को जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई के लिए सौपने की चौसर बिछा चुकी है, तो वहीँ दूसरी तरफ झारखंड राज्य के गिरिडीह जिले में उद्योंगो ने सरकारी तंत्रों से मिलीभगत कर मापदंडों को ताक पर रख प्रदूषण उत्सर्जन की सारी पराकाष्ठा पार कर दी है। आज गिरिडीह जिले के पर्यावरण का हाल  यह कि यदि सुबह सफेद बकरी चरने (खाने) को निकले तो शाम तक इतनी काली हो जाती है कि उस मवेशी का मालिक उसे पहचाने की स्थिति में नहीं होता कि वह उसी की बकरी है। यहाँ की स्थिति तो अब नागासाकी-हीरोसीमा सरीके हो चली है क्योंकि बच्चे तक अपंग जन्म ले रहे हैं।

हालांकि, स्थानीय लोग हवा में जल रहे बाती के भांति उद्योगों द्वारा बे-रोक-टोक फैलाये जा रहे प्रदूषण के खिलाफ लगातार संघर्षरत है परन्तु यहाँ के स्थानीय विधायक निर्भय कुमार शाहबादी के खुदकी फ़ेक्ट्री होने के कारण इस मामले में  दस वर्षो से कुंभकर्णी निद्रा में सोये हुए हैं, तो वहीं भाजपा सांसद रविन्द्र पाण्डेय अपनी कुर्सी बचाने को लेकर अपने ही दल के विधायक ढूलू महतो संग ‘मी टू’ जैसे मामले को लेकर दो-दो हाथ करने में व्यस्त हैं ज्ञात रहे रविन्द्र पाण्डेय पांच बार से यहाँ के भाजपा-सांसद रहने के बावजूद भी इस मामले इन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की और इधर उद्योगपतियों की इस अन्तहीन हवस ने वहां के प्रकृति में अन्तर्निहित सामंजस्य को तितर-बितर कर दिया है। ऐसी में झारखंडी जनता को मौजूदा व्यवस्था के इन नुमाइंदे विधायक-सांसद से यह उम्मीद करना बेमानी लग रहा है कि वे अभी या कभी भी इन्हें इस संकट से उबारेंगे।

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