Breaking News
Home / News / National / सरकारी स्कूलों को मर्जर के नाम पर बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी
सरकारी स्कूलों की स्थिति

सरकारी स्कूलों को मर्जर के नाम पर बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी

Spread the love

सरकारी स्कूलों को मर्जर के नाम पर आखिर बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी भाजपा के रघुबर सरकार को 

वैसे तो बच्चों की पहली पाठशाला उसका परिवार और समाज होता है। लेकिन स्कूल की अपनी ही एक महत्ता है। यह ऐसा स्थान होता है, जहाँ बच्चों में सामूहिकता की भावना के साथ कला और श्रम की संस्कृति का बोध करवाता है। बेशक स्कूल केवल शिक्षा का ही केन्द्र नहीं बल्कि उनके मानसिक और शारीरिक विकास को गति प्रदान करने वाला स्थान भी होता है। इसलिए बच्चों के भविष्य के लिए किसी भी सरकार की यह जि़म्मेदारी होती है कि वह सरकारी स्कूल के रूप में शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा जनता को मुहैया करवाये।

देश के सरकारी स्कूलों पर एक नज़र दौड़ायें तो पाते हैं कि मौजूदा सरकार सरकारी स्कूलों को ख़त्म करने की साजिश कर रहे हैं। आज भारत के किसी भी राज्य में ख़ास कर झारखंड में सरकारी स्कूलों के हालात अच्छे नहीं हैं। देश में पूँजीपति वर्ग की नुमाइन्दगी करने वाली भाजपा सरकार ने इस क्षेत्र में भी पूँजी के लिए बाज़ार खोलते हुए शिक्षा को भी बाज़ारू माल बना दिया है। पूँजीपति वर्ग इस क्षेत्र में बढ़ता मुनाफ़ा देखते हुए पूँजी लगान शुरू कर दिया जिससे देश में प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ गयी।

इससे राज्यों के सरकारी स्कूलों में जहाँ 1.3 करोड़ एडमिशन की कमी आयी तो वहीं निजी स्कूलों में 1.75 करोड़ नये एडमिशन हुए। इसी का आड़ ले झारखंड के रघुबर सरकार ने कम बच्चों का बहाना बना मर्जर के नाम पर अबतक 19 हज़ार सरकारी स्कूल बंद कर चुके हैं। और अन्य राज्यों में भी व्यवस्थित तरीक़े से सरकारी स्कूलों का अस्तित्व ख़त्म करते हुए प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा देने का सिलसिला ब-दस्तूर जारी है। जिससे अब यह विद्या का मंदिर शिक्षा का केन्द्र न रहकर व्यापार बन गया है। आज स्थिति यह है कि एक गरीब भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों के बजाय प्राइवेट स्कूलों में भेजने को मजबूर हुए हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार देश के तकरीबन एक लाख से ज़्यादा सरकारी स्कूलों को केवल एक ही टीचर चला-पढ़ा रहे हैं। आज भी झारखंड जैसे राज्यों में बाँसों की ओंट पर अटकी फूस की छत के नीचे चलने वाली स्कूलों के ज़मीन पर बैठ शिक्षकों का राह तकते बच्चे मोदी-रघुबर के डिजिटल इंडिया की पोल खोलते नजर आते हैं। सरकारी रिपोर्ट बताती है कि मौजूद समय में देश भर में केवल प्राथमिक स्कलों नौ लाख पद में रिक्त हैं।

बहरहाल, इन हालात में कौन गरीब चाहेगा कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़े। इसलिए अगर इन सरकारी स्कूलों को बचाने का प्रयास आज नहीं किया गया तो हमारे बच्चों का भविष्य बेहद ख़तरनाक होने वाला है। आज शिक्षा के प्रत्येक पहलू को हर दृष्टिकोण से देखते हुए पूरे देश में एकसमान शिक्षा व्यवस्था लागू करवाने के लिए सत्ता में बैठी जनविरोधी सरकार को हटा नयी इबारत होगी। क्योंकि यदि मोदी सरकार 1968 शिक्षा नीति के अनुसार अगर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत भी शिक्षा पर यदि ख़र्च नहीं सकती तो इसे सत्ता में बने रहने का कोई हक़ नहीं!

  • 47
    Shares

Check Also

एबीपी

एबीपी के कार्यक्रम में हेमंत सोरेन ने गोदी मीडिया की उड़ाई धज्जियाँ  

Spread the loveझारखण्ड के हुक़्मरान यह यक़ीन दिलाना चाहते हैं कि राज्य में सब कुछ …

गिरिडीह

गिरिडीह समेत झारखण्ड की रैयतों की भूमि पर रघुवर सरकार का डाका 

Spread the loveगिरिडीह समेत झारखण्ड की रैयतों सावधान  इसमें कोई संदेह नहीं कि फासीवादियों की …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.