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संविधान जब सत्ता ही हो जाये तो फिर गणतंत्र दिवस किसके लिए !

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सत्ता ही संविधान हो गया है 

26 जनवरी की पूर्व संध्या पर तीन “भारत रत्न” मिलने की खबर समेत देश ने 70वें गणतंत्र दिवस को भी मना लिया। राजपथ से लेकर जनपथ और राज्यों में राज्यपालों के तिरंगा फहराने की चकाचौंध के तले यह गणतंत्र दिवस भी सत्ता के उन्हीं सरमायदारो के इर्दगिर्द सिमट गया, जिनकी ताकत के आगे लोकतंत्र ही नतमस्तक है।

तो सवाल यह है कि 2015 में ही जिन 703 गांव को गोद लिया गया था उनमें 80 फिसदी तकरीबन 550 गांव की हालत का सच यह है कि उनकी स्थिति और भी जर्जर हो गई है। साथ ही देश के सामने लूट तले चलती गवर्नेस का सवाल ज्यादा बडा हो गया है। यह रिजर्व बैक के आंकड़ों को देखने भर से समझ आ जाती है। जहां जनता का पैसा कोई कारपोरेट या उद्योगपति कर्ज के तौर पर बैंक से लेता तो है। लेकिन उसके बाद देश के हालात ऐसे बनते हैं कि ना तो उघोग पनपते है और ना ही कोई धंधा। कोई प्रोजेक्ट उडान भर सके ऐसा भी देखने को नहीं मिलता।

यदि इकॉनमी का रास्ता लूट का हो और बैकिंग सिस्टम को लूट में कैसे तब्दिल किया जा सकता है आंकडो के माध्यम से देखना रोचक है।  2014-15 में कर्ज वसूली केवल 4561 करोड रुपए की हुई और कर्ज माफी 49,018 करोड की हो गई। 2015-16 में 8,096 करोड रुपय कर्ज वसूल हुई  तो 57,585 करोड रुपये का कर्ज माफ हो गया। इसी तरह 2016-17 में कर्ज वसूली सिर्फ 8,680 करोड रुपये की हुई और 81,683 करोड की कर्ज माफी कर दी गई। जबकि 2017-18 में बैको ने 7106 करोड रुपये की कर्ज वसूली के साथ ही  84,272 करोड रुपये कर्ज माफ किए।

मसलन, एक तरफ अगर किसानो की कर्ज माफी के नाम पर तो सत्ता के पसीने छूट जाते हैं। वहीँ दूसरी तरफ 2014 से 2018 के बीच बिना हो हंगामे के 2,72,558 करोड रुपये राइट ऑफ कर दिये गये। सीधी भाषा में कहें तो बैको के दस्तावेजो से उसे हटा दिया गया ताकि बैंक घाटे में ना दिखे। जबरदस्त एवं कमाल की लूट प्रणाली है।

बहरहाल, लोकतंत्र का तकाजा यही कहता है की जब सत्ता ही संविधान हो तो फिर गणतंत्र दिवस भी सत्ता के लिये ही होगा। और लोकतंत्र के पहरेदार, सेवक, स्वयसेवक, प्रधानसेवक सभी खुश है कि देश भर के तमाम सरकारी इमारते रौशनी में नहायी हुई है। हमारा लोकतंत्र अब इमारतों में बसने को मजबूर है और उसकी पहचान या काम संविधान की रक्षा नहीं बल्कि एलईडी की चमक बिखेरना भर है।

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