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बजट : चुनावी महासमर में रघुबर के फेंके बजटीय पासे की चौसर छोटी!

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वित्त मंत्री जेटली के कैंसर इलाज हेतु न्यूयार्क चले जाने की स्थिति में सवाल है कि केन्द्रीय बजट एक फरवरी को पेश कौन करेगा? ऐसी स्थिति में 31 जनवरी को पेश होने वाले आर्थिक समीक्षा के आंकडे क्या मैनेज होगें? आर्थिक सलाहकार ने अपने पद से इस्तीफ़ा देकर इसके संकेत तो दे दिए हैं। तो क्या इस बार बजटीय भाषण प्रधानमंत्री ही देगें और अपने चिर परिचित अंदाज में स्वर्णिम काल की तर्ज पर आर्थिक आंकडे सामने रखगें। इसी उधेड़ बुन के बीच झारखण्ड में रघुबर दास ने टूटे बसंती स्वर में लोक लुभावन बजट पेश कर नया गीत गाने का असफल प्रयास किया है।

वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए ‘बाल बजट’ समेट 85,429 करोड़ रुपये का बजट मुख्यमंत्री जी ने पेश किया। सीधे तौर पर कहा जाये तो बजट में हर वर्ग को लुभाने का प्रयास हुआ है। पहले की भाँती इस बार भी वादों की लंबी फेहरिस्त है जिसे नयी शुरुआत का नाम दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल वही है कि यदि यह नयी शुरुआत है तो बीते चार वर्षों की शुरुआत क्या केवल छलावा था?

नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन का इस बजट को लेकर कहना है कि इस बजट में किसी के लिए कुछ खास नहीं है़। चुनावी महाभारत को देखते हुए रघुबर सरकार ने इस महासमर में भोलीभाली जनता को फासने के लिए फिर से जुमलों का जाल फेंका है। आगे उनहोंने ने कहा कि मुख्यमंत्री जी ने सदन में अफसरों द्वारा तैयार किए हुए कागजों के पुलिंदे को पढ़ तो दिया लेकिन यह नहीं बताया कि आशीर्वाद योजना को पूरा करने के लिए 45 हजार करोड़ लगेंगे, जबकि सरकार के पास तो कुल योजना मद के लिए केवल 48 हजार करोड़ ही है़ं। ऐसे में इसे केवल जुमला नहीं तो और क्या कहा जा सकता है।

बहरहाल, पहले से बेहाली झेल रहे किसान, युवा बेरोजगार, पारा शिक्षक आदि का साफ़ कहना है कि इस बजट में केवल दाना डालने के अतिरिक्त हमारे लिए कुछ भी नहीं है। इस सरकार ने यह बजट पेश कर केवल झारखंडी जनता के आंखों में धुल झोंकने का काम किया है। मसलन, रघुबर सरकार द्वारा झारखण्ड में चुनाव हेतु फेंके गए बजटीय पासे की चौसर ही छोटी पड़ गयी है।

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