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मंडल डैम : बाहरियों के फायदे के लिए भाजपा इतनी तत्पर क्यों?

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लगभग 40 साल पहले कोयल नदी पर मंडल डैम (बांध) की बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। ऊंचाई 64.82 मीटर तय की गयी है, जिसकी बिजली उत्पादन क्षमता 12 मेगावाट। पर आज तक उसका काम पूरा नहीं हुआ। हालांकि इस अधूरे बांध की वजह से उजड़े लोगों की जिंदगी हाशिये पर है। लोगों की जिंदगी नरक बना दी है। बांध प्रभावितों के लिए मुआवजा और पुनर्वास तो दूर की, सरकारी सुविधायें जैसे स्कूल, अस्पताल आदि से महरूम कर दिया गया है। डूब-क्षेत्र में आने वाली गांवों को बगैर मुआवजा दिए ही राजस्व-गांव की सूचि से हटा दिए गए। रोशनी के नाम पर सपने दिखाने वाली डैम ने चार दशक से शहीद नीलाम्बर-पीताम्बर के गाँव सहित गढ़वा के कई गाँव के हजारों लोगों की जिंदगी में अंधेरा फैला दी हैं।

अभी घाव भरे भी नहीं थे कि एक बार फिर मोदी-रघुबर सरकार ने इस बांध को शीघ्र शुरू कर अपने आकाओं को खुश करने हेतु बिजली उत्पादन के काम में जुट गयी है। इस मुद्दे पर पहले से ही सरकार की ओर से यह कहा जाने लगा है कि यहां 5,000 से अधिक लोग अवैध तरीके से बस गए हैं, उनका कुछ नहीं किया जा सकता और ग्रामीणों का जो आंदोलन चल रहा है उसे ग्रामीण नहीं बल्कि माओवादी संचालित कर रही है। साथ ही अपने चिर-परिचित अंदाज में कांग्रेस पर इलज़ाम लगा रही है।  इसी बीच भाजपा-संघ के झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल जी ने भी बयान दिया है जब वे मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने इस परियोजना को ठंडे बसते में डाल दिया था। ऐसे में यह सवाल लाज़मी हो जाता है कि जब इन्हें इतनी फिकर थी तो इस मुद्दे को सुलझाने के बजाय नासूर क्यों बनने दिया।

नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे पर कहा कि यह सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देने के बजाय उनके  गांव को ही डूबाने पर अमादा है। पीएम के हाथों मंडल डैम का शिलान्यास इसका ताज़ा उदाहरण है। ज्ञात रहे, सरकार को इसकी चिंता नहीं कि मंडल डैम का निर्माण कार्य पूरा होते ही वीर शहीद नीलांबर-पीतांबर का गांव डूब जाएगा।

बहरहाल, इस परियोजना में झारखंड की 2855 वर्ग किलोमीटर जमीन जाएगी व 1600 से अधिक परिवार विस्थापित होंगे। जबकि इस परियोजना से झारखंड की महज 17 फीसद भूमि सिंचित होगी और बिहार की 83 फीसद भूमि। यानी झारखंड को कोई फायदा नहीं। फिर ऐसी परियोजना के निर्माण अथवा जीर्णोद्धार करने पर भाजपा क्यों तत्परता दिखा रही है? जबकि झारखंड गठन से पूर्व विकास के नाम पर 30 लाख एकड़ से अधिक भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है, जिसकी जद में लाखों लोग विस्थापित हो चुके है और उन्हें अबतक न मुआवजा मिला और न ही उनका पुनर्वास हुआ है।

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