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मानदेय के नाम आदिवासियों को आपस में लड़ाने का प्रयास

मानदेय के नाम पर आदिवासियों को आपस में लड़ाने की साजिश

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मानदेय के नाम पर सरकार भ्रम फैलाने की स्थिति में 

प्रागेतिहासिक काल में मनुष्य जब घूमते हुए थक गए होंगे तब उन्हें ख़याल आया होगा बसेरा बना कहीं एक ही जगह थम जाया जाए। उस स्थान पर घर बनाये होंगे, सुरक्षा एवं आपसी कलह के अनुभवों से नियम बनाये होंगे। बाद में खान-पान, बेटी-रोटी एवं प्राकृतिक से सामंजस्य-संबंध स्थापना हेतु संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपरायों को गाढ़े होंगे। इसी आदिम सामाजिक व्यवस्था के ढर्रे को आदिवासी कह हम संबोधित करते हैं।  यह भी सच है झारखंडी आदिवासी इस पुरी सभ्यता को अबतक संभाल कर रखने एवं बचाने  की जुगत में लगातार प्रयासरत हैं।

झारखंडी आदिवासी समुदायों ने  हजारों वर्षो के अपनी सामूहिक चेतना का प्रयोग कर सामाजिक स्वशासन व्यवस्था का निर्माण किया। साथ ही जरुरत पड़ने पर ट्रायल-एरर के आधार पर उसमें सुधार करते हुए समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए खुद को तैयार किया। माझी परगना, मुंडा मानकी, पड़हा राजा आदि जैसे सामाजिक व्यवस्था इसी के परिणाम स्वरुप अस्तित्व में आयीं। इन व्यवस्थाओं में सामाजिक, आर्थिक, सांकृतिक, विधिक और अध्यात्मिक सत्ता के गुर छुपे हुए हैं। अब गौर करने वाली बात यह है कि अनादी काल से ये सामाजिक और अध्यात्मिक अगुओं ने केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभायी।

झारखण्ड के विभिन्न जिलों में बसने वाले 9 आदिम जनजातियों समेत 32 जनजातियाँ आज सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर कंगाली का दंश झेल रही है। झारखण्ड सरकार ने मौजूदा वक़्त में जान बुझकर इन आदिवासियों को आपस में लड़ाने की मंशा पाले इन अगुओं को मानदेय देने का फैसला किया है। इसी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कड़ी में रघुबर सरकार ने संथाल समुदाय के अध्यात्मिक अगुओं को मानदेय तो दिया लेकिन अन्य समुदाय जैसे भूमिज, मुंडा, उरांव, महली, हो आदि के अध्यात्मिक अगुओं को नहीं। साथ ही ग्राम प्रधान को भी मानदेय दे रहे हैं और ग्राम सभा के प्रधान को नहीं।

बाहरहाल, यह सरकार जहाँ मानदेय के नाम पर केवल आदिवासियों को आपस में लड़ाने का प्रयास करती दिख रही है। तो दूसरी ओर आदिवासियों और मूलनिवासियों के बीच में सामाजिक दुरी और शौहर्द को बिगाड़ने का भी काम कर रही है। सरकार द्वारा ग्राम सभा प्रधान और ग्राम प्रधान जैसे शब्दों का प्रयोग कर लोगों को उलझन में डालना केवल उन्हें आपस में लड़ाना नहीं है तो और क्या है। जो निश्चित रुप से भविष्य में व्याप्त झारखंडी एकता को खंडित करेगा।

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