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ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट
ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट

ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट, अब कृषि के नाम पर फिर से हाथी उड़ेगा

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ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट

अब तक रघुबर सरकार ने झारखंड में जब भी योजनाओं के माध्यम से निवेश लाने का दावा किया है,  झारखंड की जनता को उसकी कीमत चुकानी पड़ी है। मोमेंटम झारखंड, स्किल समिट, माईनिंग शो जैसी योजनाएं रघुबर दास के फ्लॉप शो के ज्वलंत उदहारण हैं। लेकिन इस बार ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट द्वारा कृषि के क्षेत्र में निवेशकों को शामिल कर किसानों की आय दोगुनी करने का दावा कर रही है।

रांची स्थित खेलगांव में 29 और 30 नवंबर को होने वाले ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट की तैयारी जोरशोर से की जा रही है। हमेशा की तरह इस बार भी रघुबर सरकार ने राजधानी समेत पूरे झारखंड को बैनरों और पोस्टरों से पाटकर रख दिया है। कृषि सचिव पूजा सिंघल के अनुसार,राज्य के 10 हजार से अधिक किसान समिट में भाग लेंगे, जिनके ठहरने और खाने का उचित प्रबंध किया जा रहा है। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने किसानों को मुख्य अतिथि का दर्जा दिया है, इसलिए उनकी सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जा रहा है। कार्यक्रम स्थल पर कृषि, पशुपालन और डेयरी उद्योग और बागवानी से जुड़े यंत्रों की प्रदर्शनी भी लगायी जाएगी।

मुख्यमंत्री महोदय ने दावा किया था कि इस समिट के माध्यम से कृषि क्षेत्र में विदेशी निवेशकों की बाढ़ आने वाली है। साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा कि झारखण्ड में निवेशकों के लिए जमीन की कमी नहीं है, सरकार उनका स्वागत ग्रीन कारपेट बिछाकर करेगी। इसको लेकर उन्होंने सिंगापूर, इजराइल, लॉस वेगास आदि देशों का दौरा भी किया था। अब सवाल यह है कि कितने विदेशी निवेशक ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट में दिलचस्पी दिखा रहे हैं? मुख्यमंत्री महोदय के विदेशी दौरों का नतीजा तो पूरी तरह फुस्स ही दिख रहा है। अभी इस कार्यक्रम के प्रेस कॉन्फ्रेस और विज्ञापनों में ध्यान दें तो इनका जिक्र भी नहीं किया जा रहा है। पूरे कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार के दृष्टिकोण बदल दिए गये हैं। फ़िलहाल पूरा मुख्यमंत्री महकमा इसके फायदे गिनाने, झारखंड का विभिन्न कृषि उत्पादन में राष्ट्रीय स्तर पर रैंक बताने और किसानों को दिए जा रहे ‘वी.आई.पी ट्रीटमेंट’को बखानने में लगा है।

रघुबर जी एक तो आपने किसानों का एक शोषित समाज खड़ा कर रखा है। इन्हें अब तक न ही न्यूनतम मूल्य पर बीज, कृषि के लिए आधुनिक यंत्र और न ही फसलों के उचित दाम मिल रहे हैं, सरकार द्वारा किसी भी तरह का प्रोत्साहन न दिए जाने के कारण किसान आत्महत्या करने को मजबूर है। ऐसे में ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट, सरकार के नाकामियों को धोने में कौन सी जादू की छड़ी का काम करेगी? क्योंकि आपकी सरकार की पिछली योजनाओं के अनुभव से कहना गलत नहीं होगा कि इस बार कहीं झारखंडी आदिवासी-मूलवासियों को अपने कृषि की भूमि या कृषि रोजगार से हाथ न धोना पड़ जाये।

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