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लुगुबुरु घंटाबाड़ी
लुगुबुरु घंटाबाड़ी के आयोजक एक ही हैं

लुगुबुरु घंटाबाड़ी राजकीय उत्सव: धार्मिक अतिक्रमण की साजिश तो नहीं है!

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गोमिया प्रखंड के लुगुबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़, लुगुबाबा पुरे संथाल समाज के साथ 12 वर्षों तक संथाल संविधान और संस्कृति की रचना करने वाले के सम्मान में दो दिवसीय 18वां अंतर्राष्ट्रीय सरना महाधर्म सम्मेलन (राजकीय महोत्सव) आयोजित किया गया। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने दीप जला एवं नारियल फोड़कर इस कार्यक्रम की शुरुआत की। यहाँ के अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संथाल समाज के लोग सीधे-सादे व सरल हैं। किसी भी सभ्य समाज के लिए धर्मांतरण उचित नहीं। बेटियों को सम्मान दे, पहले पढ़ाई कराये, फिर विदायी करे जैसी लोकलुभावन बाते कहीं। उन्होंने मुख्यरूप से कहा कि पिछली सरकारों ने यहाँ विकास नहीं होने दिया।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि वे किन सरकारों की बात कर रहे है 18 वर्षों में 14 वर्ष की सरकार तो भाजपा की ही रही है।  इनके पहली वाणी से तो हर कोई सहमत हो सकता क्योंकि संथाल समाज क्या कोई भी आदिवासी समाज के लोग सरल ही होते हैं। ऐसा नहीं होता तो किसी भी सूरत में छत्तीसगढ़ का बासिन्दा झारखंड का मुख्यमंत्री नहीं बन सकता था। रही उनके दूसरे अन्य सवालों का तो मुख्यमंत्रीजी कहते हैं पहले बेटी पढाओ फिर विदाई करे। विडम्बना देखिये जिस राज्य के सरकारी आंकड़े बेटी सुरक्षित नहीं होने की गवाही देते हो और और लगातार स्कूल बंद हो रहे हों तो सवाल है कि कैसे बेटी पढ़े और बढ़े! वे कहते हैं धर्मान्तरण उचित नहीं,  जिसके अनुषंगी दल कहते है सरना-हिन्दू एक ही है तो इन्हें यह कहते कतई शोभा नहीं देता।

बहरहाल, जाहेरडंगरी संथालों का एक विशेष उत्सव और संस्कृति है जिसमें प्रत्येक पांच सालों में समाज द्वारा गाय की बलि देने की प्रथा है। परन्तु अर्जुन मुंडा की सरकार ने 2005 में  झारखंड गोजातीय वंश हत्या के निषेद अधिनियम पारित करने से यह समाज जाहेरडंगरी अब नहीं मना सकता है। सत्य तो यह है कि संथाल समाज में स्थापित विश्वास पद्धति, जीवन दर्शन, संस्कृति, परंपरा, रूढ़ को मानने से ही सरना धर्म को बचाया जा सकता है। संथाल समाज के शादी में दुल्हन के माता पिता को “गोनोंग” देने की परमपरा है जिसमे गाय या बैल दान में देने का पुरानी प्रथा है। चांडिल में अपनी संथाली परंपरा के निभाने के कारण तीन लोगों को जेल भेज दिया गया है।

इस मुद्दे पर संथाल समाज के अखिल भारतीय स्तर के संगठन, All India Santali Writers’ Association, ASECA, संथाल समाज के पारंपरिक व्यवस्था माझी परगना महल ( माझी, परगना–सोशल हेड) का मौन होना, मुख्यमंत्रीजी का भी सरना धर्म कोड पर एक शब्द भी नहीं बोलना, संथाल समाज के आदिवासियों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर इन संस्थानों की किरकिरी हो रही है। ऐसे में इन संगठनों पर आरोप लग रहे हैं कि ये प्रत्यक्ष और अप्रतयक्ष रूप से आर एस एस और इसके अनुसांगिक संगठनों के गिरफ्त में आकर इनके एजेंडो को आगे बढ़ने का काम कर रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय सरना महाधर्म सम्मलेन  के आयोजकों के पृष्ठभूमि को देखने से यह साफ़ हो जाता है कि जो लोग आर एस एस के लिए काम करते है वही लोग इस महाधर्म सम्मलेन के आयोजक भी थे। लुगुबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ का हिन्दुकरण कोई आज्ञानता से नहीं हो रहा है बल्कि धार्मिक और राजनीतिक षड्यंत्र के तहत आर. एस. एस और भाजपा के कुचाल में फंस कर रहे हैं।

नरेश मुर्मू  इसके विरोध में अपने वाल पर लिखते हैं कि  “जब बारिश के समय बर्षा थमने का नाम नही लेता, तो बच्चे हजारों साल पहले चली आ रही लोककथा को बोलते हैं – देला सितूंग देला सितूंग आले आतू ते, दू दाः दू दाः घण्टाबड़ी ते!  जब यह बात हजारो बर्षो से चली आ रही है तो किस आधार पर ये कह रहे हैं कि लुगुबुरु घंटाबाड़ी की स्थापना 2001 मे हुई! The Places of  Worship (Special Provisions) Act, 1991 के अनुसार आपके धार्मिक परिसर/सीमा क्षेत्र मे दूसरे Forest Right Act 2006 मे समुदाय विशेष को वनभूमि देने का प्रावधान है तो लूगूबूरू घण्टाबड़ी को अब तक संथाल समाज के नाम से सरकार क्यों अबतक आबंटित नही की है? लुगुबुरु घंटाबाड़ी की स्थापना 2001 मे दिखाना कहीं हमे Religious Act 1991 से वंचित करना तो नही? इसे राजकीय महोत्सव घोषित कर हमारी सामाजिक/धार्मिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयास तो नहीं? हमारे हाथ से बैदू हाड़ामाःअ धोरोम गाढ़ (वर्तमान मे देवघर बैद्यनाथ धाम ) निकल गया, राजरपाःअ निकल गया, क्या अब लुगुबुरु घंटाबाड़ी धोरोम गाढ़ का भी अतिक्रमण करने का प्रयास तो नहीं? हम सरना धर्म के लोग प्रकृति के पूजारी है, हमारी सनातन धर्म के साथ कोई मेल नही, ठीक दो समानान्तर रेल पटरी की तरह है। चूँकि हमारे पूर्वजो द्वारा बनाई गई विश्वासपद्धति शक्तिपूजा पर आधारित है, इसलिए यहाँ बलि एक प्रथा है, पर सनातन धर्म भक्तिपूजा है, इसमें नारियल केला …! आग्रह है इसकी विवेचना करें एवं इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए आगे आए।

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