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कृषि उत्पादन में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग और झारखंड के 129 प्रखंड सूखाड़

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पिछले साल की बजटीय घोषणा के अनुसार केन्द्र कृषि मन्त्रालय ने कृषि उत्पादन और पशुपालन में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न राज्यों द्वारा बनाये जाने वाले क़ानून का एक मसौदा प्रस्तुत किया है। प्रस्तावित क़ानून का मुख्य प्रावधान हैं कि किसान अपनी ज़मीन का मालिकाना हक़ रखते हुए समूहबद्ध होकर उत्पादक संघ या कम्पनी गठ सकेंगे। यह संघ कृषि माल क्रेताओं से सीधे अग्रिम विक्रय क़रार कर सकेंगे। अतिरिक्त क़र्ज़ देने वाले बैंक, बीमा कम्पनी, अन्य कृषि सम्बन्धित कम्पनियाँ भी इस क़रार के हिस्सा । संक्षेप में कहा जाये तो एक पूर्व निश्चित रक़म के बदले में वह पूरे कृषि कार्य का संचालन अपने प्रबन्धन से सँभाल सकता है।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि झारखंड जैसे राज्य में छोटे, सीमान्त ही नहीं बल्कि कई मँझोले किसानों द्वारा की जाने वाली खेती पूरी तरह घाटे का सौदा है। उनके कृषि उत्पादन की लागत उत्पादों की बाज़ार भाव से अधिक है। यही वजहें हैं छोटे-सीमान्त किसानों के भारी क़र्ज़ में डूबने का और बढ़ती आत्महत्याओं का। ऐसे भी देखें तो अर्थव्यवस्था के 12% उत्पादन में 45% जनसंख्या लगी हो तो उसके हिस्से कंगाली के सिवा क्या आ सकता है। ऐसे में सवाल है कि क्या यह क़रार आधारित खेती इसका कोई समाधान प्रस्तुत कर सकती है?

सभी किसानों के लिए कृषि उत्पादन अलाभकारी नहीं है। बड़े भूपतियों, अमीर किसान जैसे ज़मीन किराये पर लेने वाले व्यावसायियों का एक वर्ग भी अस्तित्व में आया है। यह तबक़ा श्रमिकों की श्रम शक्ति ख़रीद कर लाभप्रद खेती करता है, साथ ही छोटे-सीमान्त किसानों और बाज़ार के बीच का बिचौलिया बनकर भी लाभ कमाता है; सरकारी समर्थन मूल्यों का लाभ भी यही तबक़ा लेता है।

बहरहाल, अब इस तबके की इस धीमी गति के जारी प्रक्रिया को और तेज़ बनाने के लिए क़ानूनी प्रावधान किया जा रहा है। इन क़रारों के अन्तर्गत होने वाली कृषि प्रभावी रूप से व्यवसायी कॉर्पोरेट खेती ही होगी जिसमें इन छोटे ज़मीन मालिकों को ज़मीन का कुछ किराया ही प्राप्त होगा या ख़ुद की श्रम शक्ति बेचने पर मज़दूरी भी प्राप्त कर सकेगी। लेकिन अधिक पूँजी निवेश और उन्नत यन्त्रों के प्रयोग से श्रमिकों की ज़रूरत भी बहुत कम हो जाएगी। मजबूरीवश कितनी ही ज़मीनों को धौंस दिखा हड़प लिए जायेंगे। साथ ही कृषि में भी पूँजी और उत्पादन का केन्द्रीकरण तेज़ होगा तथा वर्ग विभाजन स्पष्ट हो जायेगा। पूँजी निवेश और उन्नत तकनीक के उपयोग से उत्पादकता तो बढ़ेगी किन्तु अति उत्पादन और संकट के दौर भी आयेंगे। तुलनात्मक रूप से छोटे उत्पादकों के लिए विनाश के द्वार खुलेंगे। जैसे आज अमेरिका में 200-400 एकड़ वाले पारिवारिक किसान भी बड़े पैमाने पर औद्योगिक कृषि के आगे बरबाद हो आत्महत्या कर रहे हैं।

इन्हीं परिस्थित्यों के बीच सरकार ने झारखंड के 18 जिलों में 129 प्रखंडों को सुखाग्रस्त घोषित किया है और अन्य ढपोरशंखी वायदों की तरह रहत देने का वायदा भी किया है। अब देखना यह है कि यह राशि कबतक और किन्हें प्राप्त होती है।

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