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परिभाषित झारखंड स्थानीय नीति के तहत मूल खतियानधारी वंचित क्यों ?
परिभाषित झारखंड स्थानीय नीति के तहत मूल खतियानधारी वंचित क्यों ?

झारखंड स्थानीय नीति : परिभाषित स्थानीय नीति के तहत मूल खतियानधारी वंचित

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परिभाषित झारखंड स्थानीय नीति के तहत मूल खतियानधारी वंचित क्यों ? –पीसी महतो की कलम से…

झारखंड में भाजपा + आजसू पार्टी द्वारा बनायी गयी झारखंड स्थानीय नीति को समझने के लिए एक सूची संलग्न है। जल संसाधन विभाग द्वारा वर्ष 2016 में नियुक्त किए गए कनीय अभियंता (जूनियर इंजीनियर) के पद पर कुल 520 लोगों की नियुक्तियां हुई थी। सूची को देखने पर पता चलता है कि सामान्य वर्ग में 260 से अधिक अभ्यर्थी बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के हैं। हालांकि, सरकार दावा करती है कि 90% नियुक्तियों में स्थानीय अभ्यर्थियों की नियुक्ति हुई। लेकिन सूची में अभ्यर्थियों का जो पता अंकित है उससे पता चलता है कि 50% से अधिक लोग इस राज्य के बाहर से हैं।

जल संसाधन विभाग के सुप्रीमो चंद्र प्रकाश चौधरी है जो आजसू पार्टी के हैं। उनके विभाग में इतने सारे बाहरियों की नियुक्ति हो गई लेकिन उन्होंने कभी इसका विरोध नहीं किया। करते भी कैसे, झारखंड स्थानीय नीति परिभाषित होने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उन्होंने ही तो कहा था कि हमारी सरकार ने सबसे अच्छी झारखंड स्थानीय नीति बनाई है। इन 50% सीटों पर बेशक प्रतिभावान आदिवासी-मूलवासी छात्रों का हक बनता था, परंतु ऐसा हुआ नहीं। इसके पीछे कौन जिम्मेदार हैं? यह झारखंड के मूल खतियानधारी लोगों के लिए एक चिंतनीय विषय है।

भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के अनुसार वर्त्तमान झारखंड स्थानीय नीति के अंतर्गत यह नियुक्तियां सटीक बैठती है क्योंकि, भाजपा बाहरियों को झारखंड में समान रूप से अवसर देने के पक्ष में अर्जुन मुंडा के कार्यकाल से ही पक्षधर रही है। लेकिन आजसू पार्टी तो हमेशा से ही खतियान आधारित ( मूल खतियानधारी ) झारखंड स्थानीय नीति का पैरवीकार रही है, उसके चुप्पी साधने के कारण झारखंड के संसाधनों पर धीरे-धीरे बाहरी लोग हावी होते जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि जूनियर इंजीनियर के आधे से अधिक पदों पर बाहरी लोगों की नियुक्तियां हो गई। ठीक ऐसी ही स्थिति महज चंद दिनों पहले हुई प्लस टू (इंटरमीडिएट) विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्तियों में भी देखी जा सकती है। इसमें भी अनारक्षित पदों पर बाहरियों की नियुक्ति कर दी गई जबकि उन पदों पर यहां के मूल खतियानधारी अभ्यर्थियों का हक बनता था।

ऐसी स्थिति में सुदेश महतो का विरोध क्यों न करें? परन्तु विरोध करने पर सत्य से आँख मूंदे  कुछ कार्यकर्ताओं को लगता है कि विरोध करने वाला एकतरफ़ा अपनी राय रखता है। उन लोगों से कहना चाहता हूँ कि अपने अगली पीढ़ियों के भविष्य के लिए आजसू पार्टी के गलत नीतियों पर टिप्पणी करना जायज है। ऐसी अंधभक्ति क्या जिसके कारण अपने बच्चों से आँख मिलाने में शर्म आए! सच तो यह है कि राज्य के हर नीतिगत मामलों में आजसू पार्टी ने हमेशा समझौता किया है, जिसका खामियाजा झारखंड के मूलवासी-आदिवासियों को भुगतना पड़ रहा है। झारखंड स्थानीय नीति भी उन्हीं में एक है जिसके अंतर्गत झारखण्ड के मूमूल खतियानधारी अभ्यर्थी लगातार अपने हक़ से वंचित हो रहे हैं।

नोट : इसका कतई यह मतलब न निकाला जाये कि हम बाहरियों का विरोध कर रहे हैं। मेरा केवल यह कहना हैं कि सर्वप्रथम हमारे पेट एवं घर में खाना हो तभी तो मेहमान नवाजी की जा सकती है।

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