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प्रदूषण रहित गंगा के अनशन में जी.डी अग्रवाल का निधन
प्रदूषण रहित गंगा के अनशन में जी.डी अग्रवाल का निधन

गंगा प्रदूषण रहित बनाने के अनशन में जी.डी अग्रवाल का निधन

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गंगा को प्रदूषण रहित बनाने के लिए विशेष एक्ट की माँग करते हुए जीडी अग्रवाल (स्वामी सानंद) की 111 दिनों के अनशन के बाद कल मौत हो गयी। ज्ञात हो 86 वर्ष के पर्यवारणविद स्वामी जी गंगा में खनन पर रोक लगाकर प्रदूषण रहित बनाने के लिए बीते 22 जून से अन्न-जल त्याग अनशन पर थे। अपनी माँगों को लेकर केंद्र सरकार को इन्होने कई बार पत्र भी लिखे, परन्तु अपने आप को स्वामी-साधुओं की हितैषी बताने वाली केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार ने इस मुद्दे पर एक बार भी संज्ञान नहीं लिया और न ही इनसे वार्तालाप करने की पहल करना जरूरी समझा। फलस्वरूप माँ गंगा को बचाने को लेकर स्वामीजी ने देह त्याग दिया।

उनके इन 111 दिनों के अनशन के दौरान भाजपा सरकार ने एक बार भी सुध नहीं ली, लेकिन इनकी मौत के बाद आंसू बहाने का झूठा आडम्बर करती फिर रही है। सच तो ये है कि अगर स्वामी सानंद की माँगो पर सरकार गौर करती तो सरकार को गंगा के खनन पर रोक लगानी होती, जिसका नुकसान भाजपा सरकार के कॉर्पोरेट मित्रों और आकाओं को उठाना पड़ता। यह इनकी सामंवादी सोच और नीतियों के खिलाफ था और इसी के लिए सरकार गंगा का सौदा करने से भी बाज नहीं आयी।

हालांकि भाजपा भले ही अपने आपको धर्म, संस्कृति, और संतों-साधुओं का रहनुमा बतलाता हो, पर इनका दोमूंहा चरित्र किसी न किसी तरह बेपर्दा हो ही जाता है। हाल ही में भाजपा शासित झारखंड में स्वामी अग्निवेश को एक आदिवासी समूह के हक़ के लिए आवाज उठाने पर भाजपा समर्थकों के डंडो का शिकार होना पड़ा, और इसकी प्रतिक्रिया में रघुबर सरकार द्वारा कड़ी निंदा के दो शब्द बोल दिए गये

बहरहाल इस पूरे घटनाक्रम से भाजपा सरकार का दोगलापन फिर से उभरकर सामने आया है। 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा सरकार गंगा की सफाई और प्रदुषण मुक्त करने के नाम बड़ी बेशर्मी से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी, गंगा संवर्धन और पर्यावरण संरक्षण को मुद्दा बनाकर सदन से लेकर पूरे विश्व में ढिंढोरा पीटा। लेकिन सत्ता का लालच पूरा होते ही इनकी असलियत बेनकाब होती दिख रही है। वास्तविकता ये है कि भाजपा सरकार की तमाम योजनायें, विकास, सेवायें केवल कॉर्पोरेट घरानों तक ही सीमित हो चुकी है, आम जनता को तो अपनी छोटी-छोटी माँगों को भी लेकर सरकार के खिलाफ या तो आवाज़ उठानी पडती है या फिर अनशन कर जान की कुर्बानी देनी पड़ती है।

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