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लेबर चौक
लेबर चौक हैं या पशुयों का मेला

‘ लेबर चौक ’ हैं झारखण्ड के या पशुओं का मेला

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आमतौर पर झारखण्ड के किसी शहर में इस प्रकार का कोई नामित चौक नहीं होता। फिर भी इस राज्य के हर प्रमुख चौक को सुबह 6 बजे से 8 बजे तक  ‘ लेबर चौक ’ कहा जाता हैं। यहाँ कई किस्म के मज़दूर जमा होते हैं। राजमिस्त्री, पुताई मिस्त्री, सेटरिंग मिस्त्री, बेलदार, पल्लेदार, प्लम्बर आदि। इन स्थानों पर नाबालिग से बुजुर्ग, बिल्कुल नये से लेकर अनुभवी और पारखी, सभी प्रकार के मज़दूर इस ‘ लेबर चौक ’ उपलब्ध रहते हैं। गाँव से अभी-अभी झोला लेकर उतरा हुआ मज़दूर भी यहाँ मिलेगा। कई-कई वर्षों के अनुभव वाले या घाट-घाट का पानी पी चुके मज़दूर भी यहाँ मिल जायेंगे। ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए ऑंखों में सँजोये हसींन सपने लिये भी कई मज़दूर आपको इस जगह मिल जायेंगे। साथ ही कई-कई बरस काम करने के बावजूद अपने टूटे सपनों को ढोते निराश लोग भी मिलेंगे।

झारखण्ड के सुदूर गाँवों में जानवरों के लगने वाला मेला कभी देखा हो तभी इन स्थानों (‘ लेबर चौक ’)के दृश्य का अनुमान लगाया जा सकेगा। जिस प्रकार उस मेले में जानवरों की पूँछ उठाकर एवं कन्धे पर थापी मार उसके मेहनती होने की जाँच की जाती है, ठीक उसी प्रकार इन ‘लेबर चौकों’ पर मालिक-ठेकेदार अपनी ऑंखों का इस्तेमाल कर परखते हैं। कभी कभी तो कई साहब अपने हाथ का प्रयोग कर जाँचने का प्रयास करते हैं। इतिहास के पन्नों में पढ़ा था कि पहले के दशकों में चौराहे पर ग़ुलामों की ख़रीद-बिक्री होती थी। दशक छोड़ युग बदल गया, विज्ञान की तरक्की के माध्यम से इन्सान की पहुँच हद से पार तक हो गयी, परन्तु आज हमारे राज्य के मज़दूर उसी ग़ुलामी के जीवन जीने को धकेल दिये गये हैं।

राज्य में ठेका मजदूर अधिनियम में संशोधन के बाद ठेकेदार भाईयों को इन मजदूरों का सवाल ज्यादा चुभता देखा जा रहा है। जैसे – क्या काम करवाओगे साहब? चुनाई ऊपर होनी है या नीचे? चुनाई गारे से होगी या सीमेण्ट से? रेत और ईंट को कितने मंजिल तक चढ़ाना है? मिट्टी कितनी दूर डालनी है? टिफिन एक घण्टे दोगे या नहीं? चाय कितनी बार मिलेगी? ज़्यादा दूर काम के लिए जाना हो तो आने-जाने का किराया दोगे या नहीं? चोट लगने पर दावा-दारु करोगे या नहीं? और सबसे अधिक चुभने वाली सवाल शाम को छुट्टी कितने बजे करोगे? सवाल है कि आख़िर मज़दूर इन वाजिब जरूरतों की पड़ताल क्यों न करें?

मजदूरों के यही सवाल हैं और रहेंगे भी क्योंकि जीवन जीने के लिए हर मेहनतकश को इन जीवंत सवालों से प्रतिदिन दो-चार होना पड़ता है। बात श्रम क़ानूनों को कमजोर करने तक ही नहीं है बल्कि यह रघुबर सरकार ठेकेदारों की राह के हर रुकावट को दूर करने पर आमादा है। और यह सब हो रहा है राज्य के विकास के नाम पर। भाजपा की राजनीति पूँजीपतियों के मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए तरकीबें इसी तरह के पेश करती रही है। और जाहिर ऐसा किया है कि यह राज्य के विकास अति आवश्यक है। ऐसा न करने से राज्य गुजरात से पीछे रह जाएगा है। साथ में इनका कहना है कि सभी मेहनतकश को बिना सवाल-जवाब किये, बिना हक़-अधिकार माँगे काम करना पड़ेगा। जब जनता अपनी तबाही-बर्बादी के बारे में सोच एकजुट हो इसके विरोध में खड़े होने का प्रयास भर करते हैं तो  तरह-तरह के भावनात्मक मुद्दे भड़का इन्हें धार्मिक आधार पर बाँट पथ विमुख कर देते हैं।

अलबत्ता, झारखण्ड राज्य के मेहनतकशों को अपने अधिकारों पर इस खुली डकैती के ख़ि‍लाफ़ धर्म को अलग रख मुखर हो लड़ना होगा। आपस में एक-दूसरे से सिर फुटौवल करने के बजाय अपनी स्थिति पर सरकार से सवाल करना होगा। यदि इसके बावजूद भी सरकार इनके बारे में नहीं सोचती तो फिर आगामी चुनाव में अपने बहुमूल्य वोट को बर्बाद न कर अपने एवं आने वाले पीढ़ी के भविष्य के लिए जाँच-परख कर योग्य दल की अपने हित में सरकार बनानी होगी। यह फ़ैसला उन्हें अब करना ही होगा। तभी ‘ लेबर चौक ’ के मजदूरों के सपने पूरे हो पायेंगे।

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