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भूख से हुई मौत

भूख से कई मौतों के बाद भी सरकार क्यों चुप बैठी है?

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सवाल यह भी है कि दिल्ली में चूँकि भाजपा की सरकार नहीं है तो वहां भूख से मौत की घटना का त्वरित जाँच का निर्देश केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा दे दिया गया। परन्तु झारखण्ड में आठ दिनों से भूखी बच्ची संतोषी तड़प-तड़प का प्राण त्यागने को मजबूर हो गयी। लेकिन कभी भी यह सुनने-पढने को नहीं मिला कि केंद्र ने इस घटना में आगे बढ़कर जाँच करवाने का कोई प्रयास किया या रघुवर सरकार से कोई जवाब तलब ही किया हो? उल्टा, अमित शाह  झारखण्ड आने के उपरान्त उनकी पीठ थपथपा कर चले गए।

सुप्रीम कोर्ट के दिए आंकड़े केवल झारखण्ड के अनुसार अबतक भूख से कुल 14 गरीब लोगों की मौत हुई है जिनमे संरक्षित जनजाति भी शामिल है। मृतक की पत्नी के द्वारा बार-बार पुष्टि किए जाने के बावजूद कि उनके घर में तीन दिनों से कोई चूल्हा तक नहीं जला, सरकारी अधिकारियों ने जाँच तो दूर पोस्टमार्टम भी करवाना जरूरी नहीं समझा। और बिना जाँच के ही इस भूख से हुई मौत को बीमारी से हुई मौत बता कर पल्ला झाड़ लिया। देश और झारखण्ड राज्य की पृष्ठभूमि पर इस चुभते हुए प्रश्न का जवाब क्या सूबे के मुख्यंत्री रघुवर दस जी देंगे?

बरहाल, इन आंकड़ों का का सरकार पर कोई फर्क पड़ा हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। भूख की सूचकांक में झारखण्ड की स्थिति लगातार खराब होती जा रही हैं। और यह सब तब हो रहा जा जब भारत के पास अतिरिक्त खाद्य भंडारण है। हरित क्रान्ति के बाद से भारत में भी अनाज का उत्पादन तेज़ी से बढ़ा, जिसकी वजह से किसानों से खरीदे हुए अनाज से खाद्य निगम के गोदाम भरे पड़े हैं। इससे तो यही प्रतीत होता है कि रघुवर सरकार केवल अपने ढपोरशंखी दिखावे के कारण इस गंभीर समस्या से अपनी आँखे मूँद रखी है। यही स्थिति रही तो झारखण्ड प्रदेश में भूख से मौत का सिलसिला रुकने के बजाय बढ़ेगा।

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