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विद्युत श्रमिक पर सरकार का यह कैसा प्रहार !

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 श्रमिक बताने वाले मुख्यमंत्री का कैसा विद्युत श्रमिक प्रेम

केन्द्र में भाजपा की सरकार के तर्ज पर लगता है झारखण्ड की रघुवर सरकार ने भी सरकारी पद समाप्त करने की कवायद शुरू कर दी हैं। बिजली विभाग में तकरीबन 7328 हजार नियमित एवं गैरनियमित रिक्त पदों को भरने में राज्य सरकार असमर्थ दिख रही है। झारखण्ड विद्युत तकनीकी श्रमिक संघ सरकार को कहने से नहीं चूक रही है कि इन पदों को रिस्ट्रक्चरिंग के तहत समाप्त करने के जुगाड़ में वह भिड़ी हुई है।इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने झारखण्ड विद्युत तकनीकी श्रमिक संघ के पक्ष मेंमें फैसला सुनाते हुए आदेश दिया है कि दैनिक वेतनभोगी कर्मियों ( विद्युत श्रमिक ) को जल्द स्थाई किया जाये। लेकिन रघुवर सरकार ने अबतक इस दिशा में सूत भर भी कदम नहीं बढाया है।

ज्ञात हो कि सरकार अपने क्रमिक अवधि में पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत बिजली विभाग के छोटे-बड़े सभी बिजली सब-स्टेशनों को निजी हाथों में सौंपने की पहल कर चुकी है और 2015 के बाद से विभाग में टेक्निकल स्टाफ़ ( विद्युत श्रमिक ) की भर्तियाँ नहीं की जा रही हैं। रिक्त पड़े तकनीकी पदों को भरने के बजाय विभिन्न प्रकार के तकनीकी कामों का क्रमिक प्रक्रिया में ठेकाकरण कर दिया गया है।

यह ठेकाकरण कितनी तीव्र गति से किया गया है, इसका अन्दाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ 2015 में ठेके पर काम करने वाले विद्युत श्रमिक और स्थायी विद्युत श्रमिक का अनुपात क्रमशः 1:5 था, वहीं वर्ष 2018 तक यह 2:3 हो गया है। इसके पीछे सरकार द्वारा बिजली विभाग को लगातार घाटे में जाना मुख्य कारण बताया जा रहा है। इसलिए सरकार को पीपीपी मॉडल के तहत निजी हाथों में सौंपने के अलावा और कोई चारा नहीं दिख रहा है!

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि इस पार्टनरशिप के बावजूद यह घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। जबकि बिजली बिलों का न्यूनतम चार्ज बढ़ा दिया गया है तथा उक्त सालों में ठेके पर कार्यरत कामगारों का श्रम ज़बरदस्त रूप में निचोड़ा गया है। ठेके पर कार्यरत कामगारों के शोषण की स्थिति का अन्दाज़ा इतने भर से लगाया जा सकता है कि 7 व्यक्तियों के काम को मात्र 3 व्यक्तियों से करवाया जा रहा है। कहीं-कहीं तो इसके लिए मात्र 2 ही व्यक्ति नियुक्त किये गये हैं।

‘कोढ़ पर खाज’ यह है कि स्थायी कर्मचारियों को जहाँ अधिक वेतन-भत्ते और सुविधाएँ देनी होती थीं, वहीं ठेके पर कार्यरत इन कामगारों को मनमाने ढंग से मात्र 5-6 हज़ार रुपये महीना ही दिया जा रहा है, और वह भी कई महीनों नहीं दिया गया है। इन थोड़े से पैसों की ख़ातिर यह ठेका मजदूर बग़ैर किसी सुरक्षा इन्तज़ामों के बिजली के ख़तरनाक कामों को करते रहने को मजबूर हैं। इसका परिणाम यह है कि हर दिन औसतन 3 कामगार की मौत करंट लगने से हो जाती है।

ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार चायबासा-बड़बिल मुख्य मार्ग पर तार जोड़ने के क्रम में राजेश गुरसंदी (बिजली मिस्त्री या ठेका मजदूर) की मौत सूचना के आभाव में ग्रिड से पॉवर ओन कर दिए जाने से हो गयी। यहाँ हम हमारे राज्य में सुरसा राक्षसी के मुँह की तरह बढ़ती बेरोज़गारी का सहज ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं।

विद्युत श्रमिक
विद्युत श्रमिक की करंट लगने से मौत

यहाँ झारखण्ड विद्युत तकनीकी श्रमिक संघ के द्वारा उपश्रमायुक्त, डोरंडा, रांची को ठेकेदार के श्रम क़ानून का पालन नहीं करने पर लिखे पत्र (पत्रांक संख्या – SI/Aug2018/) का जिक्र करना आवश्यक हो गया है जिसकी प्रतिलिपि श्रम मंत्री महोदय को भी भेजा गया। यहाँ संघ ने आर.के.भगत, रानी संस, आनंद इंटरप्राईजेज़ पर मनमानी ढंग से काम करने का आरोप लगाते हुए लिखा है कि साल भर बीत जाने के बाद भी मजदूरों को पूर्ण वेतन नहीं दिया गया है। न्यूनतम वेतनमान का भी ख्याल नहीं रखा गया है और साथ ही अबतक इपीएफ या इएसआई का भुगतान नहीं किया गया है। जबकि ठेकेदार एवं बिजली वितरण निगम के मध्य हुए एकरारनामे में इन सभी पहलुओं पर ध्यान रखने का निर्देश दिया गया है।

निजीकरण का यह सिलसिला सिर्फ़ बिजली विभाग तक ही सीमित नहीं है, सभी विभागों का हाल और गति लगभग यही है। सरकारी नीतियों और राजनीति के प्रति आँख मूँदकर महज कम्पीटीशन परीक्षा की तैयारियों में लगे इन बेरोज़गार युवकों को ठहरकर सोचना-विचारना होगा कि जब सरकारी नौकरियाँ बचेगी ही नहीं तो बेवजह उनकी तैयारियों में अपना पैसा और समय फूंकने का क्या तुक बनता है? क्या अब इन्हें नौकरी की तैयारी के साथ-साथ प्रदेश की नौकरियों को बचाने की दिशा में नहीं सोचना चाहिए?बिजली विभाग में भर्ती होने के लिए भारी फ़ीस देकर आईटीआई कर रहे लाखों नौजवानों को तो सरकार के इस फ़ैसले का त्वरित विरोध शुरू कर देना चाहिए। आखिर उनके भविष्य के साथ यह खिलवाड़ कब तक प्रदेश की सरकार करते रहेगी? कबतक ???

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