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झारखण्ड के खेल - खिलाड़ी

खिलाड़ी और खेल के प्रति सरकार का उदासीन रवैया क्यों?

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देश को हमेशा प्रतिभाशाली खिलाड़ी देता रहा है झारखण्ड। यहाँ खेल सिर्फ एक गतिविधि नहीं बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने से जुड़ी जीवन के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। लोढा कमेटि की सिफारिशें हमारे भारतीय खेल जगत के लिए अमूल्य निधि है। इनके लागू नहीं होने के कारण भारतीय खेल जगत के साथ–साथ झारखण्ड भी खुद खेल भावना से क्रमशः दूर होता जा रहा है।

महज एक साल पहले जुलाई माह में मोरहाबादी मैदान में अंतर विद्यालय मेगा फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन कल्याण विभाग द्वारा कराया गया था। इसमें झारखंड से 1750 खिलाड़ियों को ट्रेकर और बसों में भरकर लाया गया। इस टूर्नामेंट का उद्देश्य फुटबॉल को बढ़ावा देना और अच्छे खिलाड़ियों की तलाश करना था। विभाग ने इस आयोजन में लाखों रुपए फूंक दिए और ऐसे कई टूर्नामेंट कराये गए, खिलाड़ी खेले और सब वापस अपने घर चले गए।

झारखंड में तकरीबन छोटे-बड़े मिलाकर एक हजार से ज्यादा फुटबॉल क्लब हैं और प्रत्येक साल यहाँ लगभग सात हजार से ज्यादा टूर्नामेंट का आयोजन होता हैं। हजारो गरीब खिलाड़ियों को उनके भविष्य के सपने दिखाए जाते हैं, मगर जब पूरा करने का वक्त आता है, तो सारे एसोसिएशन, खेल संघ और क्लब चादर ओढ़ सो जाते हैं। इसी का परिणाम था कि 6 अक्टूबर से दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में होने वाले फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप के लिए चुनी गई भारतीय टीम में झारखंड का एक भी खिलाड़ी नहीं था। 21 सदस्यीय टीम में सबसे ज्यादा आठ खिलाड़ी मणिपुर के हैं।

इस सन्दर्भ में नाम न छापने के अनुरोध कर कुछ खिलाड़ी अपना दुःख बयाँ करते हुए ये बताने से नहीं चुके ‘कि, झारखंड में फुटबॉल के खेल में सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। सारे क्लब और एसोसिएशन को तो सिर्फ थोक के भाव में टूर्नामेंट करा मोटे बिल वसूलने से मतलब होता है। इन्हें खेल का स्तर और खिलाड़ियों के भविष्य से कोई सरोकार नहीं होता। खेल विभाग का भी इन पर कोई नियंत्रण नहीं है। महज़ एक साल पहले सुब्रतो मुखर्जी कप में झारखंड की टीम सभी प्रतिद्वंदी टीमों को हराकर चैंपियन बनी थी। यानि जब भी झारखंड के खिलाड़ियों को मौका मिला है, उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है।

लेकिन इस सरकार के साथ–साथ यहाँ के तमाम संस्थाओं को झारखंडी अस्मिता से कोई लेना देना नहीं है, अगर होता तो क्या पैसे की किल्लत से झारखण्ड के 21 खिलाड़ी दुबई में हो रहे टूर्नामेंट में शामिल होने से वंचित होते? राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मेहनत से बेहतर प्रदर्शन कर झारखण्ड के 25 पावरलिफ्टिंग प्रतिभावान खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता ‘एशियन बेंच प्रेस प्रतियोगिता’ के लिय चयनित किए गए थे। लेकिन पैसे की कमी के कारण 21 खिलाड़ियों का इस प्रतियोगिता में भाग ले पाना संभव प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि प्रति खिलाड़ी को दुबई जा कर खेलने में लगभग 90 हजार का खर्च आता है। 4 खिलाड़ियों के भाग लेने की खबर की पुष्टि हुई है क्योंकि, इन्होंने 18 अगस्त की अंतिम तिथि के पहले खर्च राशि जमा करवा दी है, जबकि शामिल ना हो पाने वाले 21 खिलड़ियों में कई स्वर्ण पदक विजेता भी शामिल हैं।

अब सवाल यह है कि खेल के प्रति अपनी प्रतिबधता एवं समर्पित भाव दिखाने वाली प्रदेश की पोस्टरबाज रघुवर सरकार का यह कैसा खेल प्रेम है जिसके पास इन 21 खिलाड़ियों को राज्य की अस्मिता से जुड़े इस प्रतियोगिता में भाग लेने को सुनिश्चित करवाने के लिए बजट नहीं है। अभी चंद दिनों पहले ये प्रदेश के खिलाड़ियों से चाय-नाश्ता परोसवाने के आरोप में बड़े-बड़े दावों-वादों के साथ प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे थे कि यहाँ के खेल एवं खिलाड़ियों के प्रति सरकार बहुत चिंतित हैं। अब इनकी चिंता को क्या हो गया? टाइम स्क्वायर और अन्य जैसे गैरजरूरती प्रोजेक्टों में फूंकने के लिए इनके पास करोड़ों का बजट है। परन्तु राज्य की अस्मिता, खिलाड़ियों के उज्जवल भविष्य के लिए इनके पास क्यों ‘फूटी कौड़ी’ नहीं है? अच्छा है कि, अटल जी इनके करतूतों को देखने के लिए जीवित नहीं है नहीं तो वे जीते जी मर जाते।

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