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उधड़ी हुई सी है झारखंडी बुनकरों की जिंदगी

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एक अभिशाप उस ख़ुदा के लिए जिससे हम रोते रहे
भूख से मरते रहे और जाड़ों में खुले सोते रहे,
उम्मीदें बाँधीं, दुआएँ कीं, पुकारा उसे व्यर्थ ही,
वह हँसा हम पर, उपहास किया, बढ़ाया और दर्द ही।
रहे हम बुन, रहे हम बुन। — हाइनरिख़ हाइने (अनुवाद : सत्यम)

अगर अलग झारखण्ड के बाद के पूरे इतिहास को देखे तो रघुवर सरकार के पिछले 4.5वर्षों का शासन बड़ा ही भयावह लगता है। यह सरकार कैसी दिखती है? झारखण्ड में निजीकरण-उदारीकरण और श्रम के ठेकाकरण के नाम पर कुनीतियों को बड़े पैमाने पर लागू करने वाली सरकार दिखती है। विगतवर्षों के दौरान प्रदेश में जमकर निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों को लागू किया गया और अम्बानी, टाटा, बिड़ला आदि जैसे बड़े पूँजीपतियों को देश की प्राकृतिक सम्पदा और साथ ही श्रम को लूटने की पूरी छूट दी गयी। इस लूट को क़ानूनी तौर पर भी इजाज़त दी गयी और ग़ैर-क़ानूनी तौर पर भी इसे मदद पहुँचायी गयी। साथ में यह भी देखते हैं कि यह प्रदेश भूख से दम तोड़ने वाले राज्यों की सूची में अव्वल बना, इतना ही नहीं मानवता के हर क्षेत्र में यह राज्य पनाह मांगती दिखती रही। साथ ही साथ यह सरकार कई घोटाले सहित अपनी नाकामियों को पोस्टर एवं फोटोशोप की छवियों से ढकने की नाकाम कोशिश भी करती दिखी।

महालेखाकार(एजी) ने अपने ऑडिट के दौरान मिले तथ्यों के आधार पर पाया की झारक्राफ्ट का एसएचजी और बुनकर सहयोग समितियों द्वारा कंबल बुनवा कर गरीबों के बीच बांटे जाने वाले दावों की हकीकत में भारी गड़बड़ी थी। और झारक्राफ्ट द्वारा समितियों के सहारे कंबल बुनाई से संबंधित पेशदावों को गलत करार दिया। इसका सीधा मतलब था कि इन कम्बलों को यहाँ के बुनकरों द्वारा नहीं बुना गया, और जिनके द्वारा बुना भी गया तो उन्हें मानदेय नहीं मिला। मतलब साफ़ है कि इन बुनकरों को प्रस्तावित रोजगार मुहैया नहीं कराया गया था। यह सरकार झूठ बोलती है तथा ठेकेदारों के माध्यम से ही काम करवाती है। तो सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास फिर किसके लिए राँची में कार्यक्रम का आयोजन कर रैंप पर कैटवाक कर रहे है। तो क्या यह किसी प्रकार का छलावा तो नहीं?

जबकि ठीक उसी दिन झारखंड बुनकर सेवा संघ के अंतर्गतराज्य के विभिन्न जिलों से पहुंचे सैकड़ों बुनकरों ने बुनकर दिवस को ‘काला दिवस’ कह झारक्राफ्ट भवन केसमक्ष धरना प्रदर्शन कियाऔर झारक्राफ्ट द्वारा आयोजित हैंडलूम फैशन जतरा कार्यक्रम का बहिष्कार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बुनकर दिवस के दिन करोड़ों की राशि खर्च कर सिर्फ दिखावा कर रही है। यह ना तो बुनकरों के हित में है और ना ही इससे झारक्राफ्ट को किसी प्रकार का फायदा पहुँचने वाला है। यह केवल एक छलावा है।

बुनकरों की माने तो, रघुवर सरकार ने वादा किया था कि प्रत्येक सरकारी विभागों से निकलने वाले किसी भी प्रकार के वस्त्रों का कार्य झारखंड के बुनकरों द्वारा कराया जाएगा, चाहे वस्त्र की कीमत अधिक ही क्यों न हो जाए। परन्तु 9 माह के उपरान्त भी सरकार ने इस दिशा मेंकोई कदम नहीं उठाया है साथ ही बुनाई कार्य एवं बकाया मजदूरी का भुगतान अबतकनहीं हुआ है। कार्य की कमी एवं भुगतान में देरी होने के कारण बुनकरों की स्थिति अति दयनीय हो गई है।

लबोलुवाब यह है कि, प्रदेश की इस सरकार को यहाँ के गरीब बुनकरों से कोई लेना-देना नहीं है।उन्होंने इनकी जिंदगी उधेड़ी हुई सी रख दी है। अगर ऐसा नहीं है तो क्यों रघुवर जी लोगों की संवेदना छोड़ जतरा फैशन कार्यक्रम में इतने व्यस्त रहे? बुनकर झारक्राफ्ट भवन के समक्ष चीख-चीखकर अपने दर्द बयां करते रहे लेकिन क्यों मुख्यमंत्री जी इनके विलाप को सुनने तक नहीं आये? बुनकर चीख-चीख कर कहते रहे कि झारक्राफ्ट साजिशन हैंडलूम के तमाम कार्यों से उन्हें वंचित कर रही है। सरकारी समितियों और स्वयं सहायता समूह से जुड़े बुनकर भूखे मरने को मजबूर हो गए हैं।

रैंप में चलते वक़्त भी रघुवर जी जहन में बुनकरों के प्रति कोई संवेदना दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी, बल्कि उनके घमंड का पारा आसमान तक दिख रहा था। ऐसे भी सरकार को इस राज्य के भूखों से क्या मतलब! जब ये बुनकर भी भूख से मरेंगे तो सरकार कह देगी कि यह बीमारी से मरे है और फिर फोटोशोप तथा पोस्टरबाजी में इन्हें तो महारत हासिल है ही। अंत में बताता चलूँ कि बुनकरों ने एक और गंभीर आरोप इस सरकार पर लगाया है कि झारक्राफ्ट के एमडी उनसे जुड़े कार्यों को अब बड़ी कंपनियों को दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में फिर बुनकरों के नाम पर हैंडलूम दिवस मनाने का क्या मतलब है। यह छलावा नहीं तो और क्या है?

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