Breaking News
Home / News / Editorial / राज्य की 50 फीसदी आधी आबादी बेरोजगार: बेरोजगारी…भाग 4

राज्य की 50 फीसदी आधी आबादी बेरोजगार: बेरोजगारी…भाग 4

Spread the love

…लेख को शुरू करने से पहले बताता चलूँ  कि पिछले लेख में शिक्षकों के रि झारखंड में मनरेगा मजदूर की स्थिति के अलावा बाल मजदूरी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा की गयी थी । आज इस श्रृंखला का अंतिम लेख राज्य के रोजगार एवं बेरोज़गारी विषय पर बात कर ख़त्म होगी।

29 जनवरी 2017 को जब वित्त मन्त्री अरुण जेटली ने सालाना आर्थिक सर्वे संसद में पेश किया तो एक बड़ा दावा यह भी किया कि वर्तमान सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए बहुत काम कर रही है। इसके पक्ष में मुख्य बात तो यह निकली कि आर्थिक सर्वे का मुखपृष्ठ गुलाबी रंग में छपा था! साथ ही यह भी कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान चलाने वाली सरकार ने सर्वे में पूरा एक अध्याय (!) महिलाओं की स्थिति के विश्लेषण पर दिया था, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे स्वयं के जीवन पर फ़ैसले ले सकने के 17 में से 12 आयामों पर महिलाओं की स्थिति में बेहतरी आयी है। पर यह अध्याय पढ़ने पर पता चलता है कि सशक्तिकरण के सर्वाधिक अहम पहलू अर्थात महिलाओं के आर्थिक स्वावलम्बन में भारी गिरावट आयी है – 2005-06 में 36.3% स्त्रियाँ किसी किस्म का ग़ैर-घरेलू रोज़गार करती थीं। 2015-16 अर्थात 10 वर्ष बाद यह संख्या घटकर 24% ही रह गयी है! साफ़ है कि रोज़गार सृजन में भारी गिरावट और बढ़ती बेरोज़गारी का सबसे ज़्यादा प्रभाव स्त्रियों पर पड़ा है, जो बड़ी संख्या में सामाजिक कार्य जगत से ही बाहर हो गयी हैं। पर यह बेरोज़गारी के आँकड़ों में नहीं झलकता क्योंकि उसमें उनकी ही गिनती की जाती है जो रोज़गार ढूँढ़ने में लगा हो। यहाँ स्त्री मुक्ति के सवाल में जाये बग़ैर संक्षेप में यही कहना पर्याप्त है कि आर्थिक रूप से परावलम्बी स्त्री के ख़ुद के निर्णय ले पाने के सशक्तिकरण का दावा पूर्णतया मिथ्या है।

रोजगार एवं बेरोज़गारी

मुख्यमंत्री रघुवर दास दावा करते हैं कि उनकी सरकार ने लगभग 20 हजार नौकरियों का उत्सर्जन किया। मगर सवाल है कैसे? भाजपा की सरकार आने के बाद जनवरी से अप्रैल 2016 के बीच प्रदेश की बेरोजगारी दर तकरीबन 10.27 प्रतिशत थी, जबकि सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के मासिक रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 2018 के अप्रैल माह में झारखंड में बेरोजगारी दर 11.5  प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय औसत (5.9) प्रतिशत से दोगुनी है। तो फिर किस बुनियाद ….. देश में बेरोजगारी के मामले में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा के साथ झारखंड आखिरी की चार पायदान पर हैं।

  • झारखण्ड में शिक्षित युवा जो 10-12 वीं तक पढ़े है उनमें बेरोजगारीदर 7 प्रतिशत है, जबकि स्नातक तथा उससे की ऊपर पढ़ाई करने वाले युवाओं में बेरोजगारी दर 20.2% है।
  • झारखंड आर्थिक सर्वे 2016-17 के अनुसार, झारखंड में बेरोजगारी दर 7 प्रतिशत है, जो देश के औसत 5 प्रतिशत से काफी अधिक है।
  • देश में महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बहुत कम (8%) है, वहीं झारखंड में सिर्फ़ 9.2% महिलायें ही श्रमबल का हिस्सा बनती हैं। शहरी क्षेत्रों में तो स्थिति और भी बदतर है, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में 10.1% की तुलना में सिर्फ 6 प्रतिशत महिलायें ही श्रम बल का हिस्सा बन पाती हैं।
  • झारखंड में 25-29 आयु वर्ग के 30,471 युवा (5%) प्रतिशत लोगों के पास नौकरी नहीं है। जबकि 20 से 24 आयु वर्ग में करीब 563,000 युवा (35.38 प्रतिशत) एवं 15 से 19 आयु वर्ग में 175,000 (57.42 प्रतिशत) युवा बेरोजगार हैं।
  • झारखंड के शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 7.1 प्रतिशत है।
  • झारखंड में, पुरुषों में बेरोजगारी दर 9 प्रतिशत है जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा बहुत ज्यादा, यानि 22.6 प्रतिशत है।
  • 15-34 आयुवर्ग की महिलाओं में औसत बेरोजगारी दर लगभग 50 प्रतिशत है। जिससे यह साफ़ दिखता है कि किस प्रकार युवतियों को यह सरकार रोजगार से दूर रखी हुई है। इस आंकड़े को जब हम आयु वर्ष में विभक्त कर देखते हैं तो मामला और भी भयावह प्रतीत होता है।
    • 15-19 साल आयु वर्ग में 77 फीसदी महिलायें बेरोजगार है।
    • 20-24 आयु वर्ग में 38 फीसदी महिलायें बेरोजगार है।
    • 25-29 आयु वर्ग में38 फीसदी महिलायें बेरोजगार है।

झारखंड के यह आकड़े भयभीत करनेवाले हैं, अब आप समझ सकते हैं कि इस प्रदेश का भविष्य कितने अँधेरे मे है। प्रदेश की मौजूदा सरकार पूरे तरीके से रोजगार उत्सर्जन करने में विफल रही है। हालांकि, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री जी से इस मामले में शीघ्र एक श्वेतपत्र जारी करने का माँग लगातार करते रहे हैं, परन्तु यह सरकार लगातार उनके मांगों को ठुकराती रही है। अब यहाँ की जनता खुद ही निर्णय लें क्योंकि झारखण्ड आपका है।

अक्सर लोग ख़ुद ही सोच लेते हैं कि सभी को शिक्षा और रोज़गार दिया ही नहीं जा सकता या फिर यह सरकार की ज़िम्मेदारी ही नहीं है। दरअसल लोगों के दिमाग़ में इस सरकार और इसके अनुषंगी संगठनों द्वारा इस तर्क को कूट-कूटकर बैठा दिया गया है, ताकि वे शिक्षा और रोज़गार को अपना अधिकार समझकर इसकी माँग ही न करें। मगर सच्चाई क्या है? किसी भी लोकतान्त्रिक समाज में भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा पाना हर नागरिक का बुनियादी अधिकार होता है। सभी को रोज़गार देने के लिए तीन चीज़ें चाहिए– काम करने योग्य लोग, विकास की सम्भावनाएँ और प्राकृतिक संसाधन। हमारे यहाँ ये तीनों चीज़ें प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। सवाल इस सरकार की नीयत का है। पर ये अपनी गन्दी नियत को छुपाने के लिए जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर तरह-तरह के भावनात्मक मुद्दे उभाड़कर लोगों को आपस में लड़ाने और बाँटने का काम कर रही है, ताकि शिक्षा, रोज़गार, महँगाई जैसे असल सवालों पर लोग एकजुट होकर इनके खिलाफ आवाज़ न उठा सकें। इनकी यह सोच तो कहीं से भी सही नियत, सही विकास को परिभाषित नहीं करती है।

  • 2
    Shares

Check Also

बिजली

बिजली तो रघुबर सरकार सरकारी कार्यक्रमों में भी उपलब्ध नहीं करवा पा रही है 

Spread the loveझारखण्ड में मौजूदा मुख्यमंत्री के जीरो कट मुहैया कराने जैसे जुमले के बावजूद …

यूएपीए क़ानून

यूएपीए क़ानून आज़ाद भारत का सबसे ख़तरनाक क़ानून

Spread the loveयूएपीए क़ानून को आज़ाद भारत का सबसे ख़तरनाक क़ानून माना जा रहा है। देश …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.