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भूमि अधिग्रहण संशोधन (काला क़ानून) आदिवासी मूलवासी किसान पर तीखा हमला   

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भाजपा की सरकार अपने शासन काल में आम जनता की जमीन देशी-विदेशी पूँजीपतियों को देश के किसी भी राज्य में दोनों हाथों से लुटाने के लिए अति-उत्साहित है। इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार भी दिख रही है, चाहे वो Vth सेड्युल या फिर VIth सेड्युल के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र ही क्यों न हो, उसे परवाह नहीं। अपनी इस मंशा को पूरा करने के लिए यह सरकार, पिछली केन्द्र सरकार द्वारा बनाये कानून वाजिब मुआवजे का अधिकार एवं भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में पारदर्शिता कानून-2013’ में संशोधन कर आदिवासी, मूलवासी जनता, खासकर किसानों की भूमि को ज्यादा दमनकारी व गैरजनवादी तौर-तरीकों से, और भी बड़े स्तर पर उनसे छीनने की बंदोबस्त कर चुकी है। इससे सम्बंधित वाजिब मुआवजे का अधिकार और भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में पारदर्शिता (संशोधन) अध्यादेश-2014’ को तो 31 दिसम्बर 2014 को ही जारी कर दिया गया था लेकिन इसे संसद में पास करवाने की बाध्यता थी। हालांकि हम जानते हैं कि सभी संसदीय पार्टियाँ देश में विकास के लिए भूमि देशी-विदेशी पूँजीपतियों को देने के पक्ष में आपसी सहमति रखते हैं, लेकिन ये साथ में जनता के अधिकारों का भी ख्याल रखती है। लेकिन मोदी सरकार ने इस संशोधन में जनता के सारे अधिकारों को समाप्त कर सिर्फ अपने चहेते पूंजीपतियों का धयान रखा है। इसलिए झारखण्ड के झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, माकपा-भाकपा और ‘‘वाम’’ मोर्चे की अन्य सांसदीय पार्टियाँ, संसद के साथ-साथ ‘‘सड़क पर’’ भी मोदी सरकार द्वारा लाए गए इस नये कानून का पुरजोर ‘‘विरोध’’ कर रही हैं। इनके साथ ही देश के अनेक क्रान्तिकारी गुटों/पार्टियों से सम्बंधित किसान संगठन लगातार रोष-प्रदर्शन कर रहे हैं। इस कानून के खि़लाफ़ किसानों में अत्यधिक गुस्सा देखा जा रहा है। इसी कारणवश मोदी सरकार को इससे सम्बंधित काफी सफ़ाई देनी पड़ रही है। नौ संशोधनों के साथ लोकसभा में अध्यादेश पास हो चुका था लेकिन राज्य सभा में मोदी सरकार के पास बहुमत न होने के कारण यह कानून पारित नहीं हो पाया। लेकिन मोदी सरकार इतनी जल्दी में है कि उसने 5 अप्रेल 2015 को इस अध्यादेश को छः महीने की अवधि खत्म होने से पहले ही राज्य सभा के सत्र में उठा दिया। चूँकि झारखण्ड जैसे क्षेत्र में मोदी जी के खास, अडानी का पॉवर प्लांट प्रोजेक्ट अधर में लटक न जाए इस वजह से शायद झारखण्ड राज्य के लिए संशोधित बिल पर जून में राष्ट्रपति ने चुपके से मुहर लगा दी।

इस क़ानून का कुछ इतिहास समझते हैं

ब्रिटिश सरकार ने सबसे पहले 1894 में यह भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था। उस वक़्त भी जमीन छीनने के लिए सार्वजनिक हितों को ही बहाना बनाया गया था। इस कानून के अनुसार ग्रामीण विकास, ग्रामीण कल्याण, स्कूल, अस्पताल या अन्य सरकारी कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहित की जा सकती थी। इसमें दिलचस्प बात यह थी कि इस कानून के अन्तर्गत सरकार किसी निजी कम्पनी को सिर्फ उसमें काम करते मज़दूरों के हित का बहाना बना भूमि अधिग्रहित कर सकते थे। 1947, देश-आजादी के बाद भारतीय हुक्मरानों ने इस क़ानून में कई दफा संशोधन किए। भारत में उद्योगों के विकास की ज़रूरतों के मद्देनज़र 1894 का यह कानून इन्हें उपयुक्त नहीं लग रहा था, क्योंकि भारत के कॉर्पोरेट जगत को बड़े स्तर पर भूमि की ज़रूरत थी। और वे इस ज़रूरत की पूर्ति बगैर दमन के औज़ारों को तीखा किये बिना नहीं कर सकती थी। अंग्रेज़ हकूमत और भारतीय हुक्मरानों ने चाहे कई चोर-रास्तों के माध्यम से पूँजीपतियों के लिए भूमि अधिग्रहण को बड़े-स्तर पर अंजाम दिया हो परन्तु यह सत्य है कि इस कानून में शामिल सार्वजनिक हितों की परिभाषा ज़मीन लूटेरों के लिए काफ़ी अडचने पैदा करती थी। शायद यही वे कारण रहे होंगे जिसके मद्देनजर भारतीय हुक्मरानों ने 1984 में इसमें एक और धारा जोड़ दिया कि “आपातकालीन परिस्थिति में सरकार निजी कंपनियों के लिए 15 दिनों की सूचना देते हुए भूमि अधिग्रहण कर सकेगी”।

लेकिन भारतीय हुक्मरान भूमि अधिग्रहण को और सरल एवं व्यापक बनाना चाहते थे। इसलिए 2013 के केन्द्र सरकार के समय वाजिब मुआवजे का अधिकार और भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में पारदर्शिता कानून-2013’ लाया गया, 2013 के कानून में भी ज़मीन छीनने के लिए सार्वजनिक हित को ही बहाना बनाया गया। लेकिन यदि सार्वजनिक हित की परिभाषा को देखा जाये तो सन् 2013 का कानून पहले के कानून से भी अधिक दमनकारी था। इस कानून के मुताबिक सरकार सहायक ढाँचे, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के प्रोजेक्टों के लिए भूमि अधिग्रहण कर सकती थी। यानि कि अब किसी निजी कम्पनी को भूमि पर कब्जा करवाने के लिए किसी आपातकालीन परिस्थिति से सम्बंधित धारा की ज़रूरत नहीं रह गई थी। इस कानून के मुताबिक निजी कम्पनी के हित में भूमि अधिग्रहण करने के लिए कम से कम 80 प्रतिशत और सार्वजनिक-निजी भागीदारी कम्पनी के लिए 70 प्रतिशत प्रभावित ज़मीन मालिकों की सहमति ज़रूरी थी। सम्बंधित इलाकों की ग्राम पंचायत, नगर पालिका या नगर निगम के साथ विचार-विमर्श द्वारा, प्रोजेक्ट के ‘सामाजिक प्रभावों के बारे में जायजा और उनके प्रबन्धन के बारे में रिपोर्ट तैयार करना होता था। इसी के आधार पर सार्वजनिक सुनवाई करना और विशेषज्ञों के एक ग्रुप से राय लेना, सिंचाई के नीचे की और बहुफसली भूमि अधिग्रहित करने से पहले भोजन सुरक्षा यकीनी बनाने के लिए उचित कदम उठाने, फिर पुनर्वास सम्बन्धी रिपोर्ट तैयार करना, आदि चीजों को इस कानून के मानवीय पक्षों के तौर पर रखा गया था।

अब भाजपा की मोदी सरकार सन् 2013 के कानून को बदल कर और भी दमनकारी कानून लागू करना चाहती है। सरकार द्वारा पारित अध्यादेश में पाँच प्रोजेक्टों के लिए ज़मीन मालिकों की पहले सहमति लेने, सामाजिक प्रभावों और उनके प्रबन्धन के बारे में रिपोर्ट तैयार करने, सार्वजनिक सुनवाई और विशेषज्ञों ग्रुपों से जांच-पड़ताल करवाने, भोजन सुरक्षा यकीनी बनाने की शर्तों को हटा दिया गया है। यह पाँच प्रोजेक्‍ट हैं :–

  • जो प्रोजेक्‍ट राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत या इसके किसी क्षेत्र की रक्षा, रक्षा की तैयारी और रक्षा सम्बन्धी उत्पादन के लिए ज़रूरी हैं।
  • ग्रामीण बुनियादी ढाँचा के साथ बिजलीकरण,
  • मकान (सहनीय कीमतों पर व गरीब जनता के लिए) निर्माण।
  • औद्योगिक गलियारे। इनके लिए रेलवे लाईनों और राज्य मार्गों की दोनों ओर एक-एक किलोमीटर तक भूमि अधिग्रहण की जा सकेगी।
  • बुनियादी ढाँचे से सम्बन्धि प्रोजेक्ट जिसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी के ऐसे प्रोजेक्ट भी शामिल होंगे, जिनकी मालिक केन्द्र सरकार होगी। सार्वजनिक-निजी भागीदारी के अन्तर्गत आने वाले स्कूल, अस्पताल, सड़कें, नहरें आदि सामाजिक विकास के प्रोजेक्ट इसमें शामिल नहीं होंगे।

बाकी सार्वजनिक-निजी भागीदारी वाले प्रोजेक्टों के लिए उपरोक्त छूटें लागू होंगी।

मोदी सरकार ने उपरोक्त संशोधनों के माध्यम से इस भूमि अधिग्रहण को और अधिक दमनकारी और तेज़ तो बनाया ही है, साथ ही ‘‘अति-ज़रूरी’’ आपातकालीन परिस्थिति वाली धारा 40 को कायम भी रखा रखा है। कानून 2013 के मुताबिक, यदि अधिग्रहित भूमि पर पाँच सालों के भीतर तय किये गये काम की शरुआत नहीं होती है तो यह पहले मालिकों को दे दी जायेगी ऐसा प्रावधान था। परन्तु संशोधित बिल में पाँच साल के समय वाली शर्त को भी हटा दिया गया है। अब सबकुछ सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर करेगी। चाहे वे बाद में किसी को भी कौड़ियों के भाव में ये जमीन दे दें। मतलब जिसकी ज़मीन वह सड़क पर, और धनपशुओं की मौज। पहले के कानून में यह दर्ज था कि भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी यदि किसी सरकारी विभाग द्वारा गलत जानकारी, झूठे दस्तावेज, दुर्भावना की कोई कार्यवाही सिद्ध होती है तो उस विभाग के मुख्य अधिकारी को दोषी माना जायेगा और उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जायेगा। दोष सिद्ध होने पर छह महीनो की कैद या एक लाख रुपए का जुर्माना या दोनों हो सकते थे। ऐसी चीजें कितनी लागू होती हैं हम सभी जानते हैं, लेकिन मोदी सरकार ने इसे संशोधन कर अफसरशाही का बचाव किया है। अब इस संशोधन के मुताबिक विभाग के जिस अफसर या मुलाजिम के पास से गलत जानकारी या दस्तावेज पेश हुआ है सिर्फ उसी पर कार्यवाही होगी।

मूल अध्यादेश में संशोधन कर लोक सभा में पारित अध्यादेश में यह जोड़ा गया कि आदिवासियों की भूमि अधिग्रहित करने के लिए पंचायतों की सहमति ज़रूरी होगी। पर ग्राम विकास समिति एवं आदिवासी ग्राम विकास समिति के माध्यम से Vth सेड्युल और VIth सेड्युल के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में ग्राम सभा को दरकिनार किया गया है।

कानून में भूमि, मकान मालिकों को मुआवजे, पुनर्वास, सामाजिक प्रभावों के मुताबिक कार्यवाही, सार्वजनिक सुनवाई आदि की चाहे जितनी मर्ज़ी बातें हों लेकिन वास्तव में जनता को भयंकर तबाही का सामना करना पड़ता है। मुआवजे, रिहायश-रोजगार आदि के लिए उनको दर-दर की ठोकरें झेलनी पड़ती हैं। कॉर्पोरेट की सरकार सिर्फ कहने को ही इसकी गारण्टी दे सकती हैं। हकीकत में इस सरकार को जनता की कोई परवाह नहीं है। इसके अनेक उदाहरण यहाँ मौजूद है कि ‘‘सार्वजनिक हित’’ के लिए सरकार ने जो भूमि अधिग्रहण किया, वो उन्होंने उसके लिए इस्तेमाल ही नहीं की। ऐसे कई मामले हैं जिनमें पूँजीपतियों ने सरकार से कौड़ियों के भाव में भूमि हासिल कर आगे महँगे दामों में बेच डाली है। उजाड़े का शिकार हुई जनता को रोज़गार देने के जो वायदे किये गए वह झूठे निकले। वातावरण को नुकसान न पहुँचाने की जो बातें कही गईं उसकी हालत तो आप देख ही सकते हैं। हालांकि सरकारी तंत्र और पूँजीपतियों की साँठ-गाँठ से जनता के साथ धोखाधड़ी, लूट-मार के ब्‍यौरे के लिए लम्बे लेख की माँग करती हैं। इसलिय यहाँ हम बस इतना कहना चाहेंगे कि जनता के हित के जिन दावों-वायदों के नाम पर जनता की ज़मीनें छीनीं जा रही हैं, जनता की रिहायश और रोज़गार की बर्बादी की जा रही है, वे झूठ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। देश-प्रदेश की भाजपा सरकार की ज़मीन अधिग्रहण कानून का मक़सद पूँजीपतियों के लिए बड़े स्तर पर, कम समय में और सस्ती कीमत पर जनता से ज़मीन छीन कर देना है। लेकिन पहले से कहीं बड़े स्तर पर और उससे कहीं ज्यादा दमनकारी रूप में। मोदी जी को पूँजीपति वर्ग ने पूरा जोर लगा कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक इसीलिए पहुँचाया है कि उनको मोदी जी से उम्मीद थी कि आर्थिक मन्दी के इस दौर में वह उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को इससे पहले की सरकारों से कहीं अधिक तेज़ी और सख्‍ती के साथ आगे बढ़ायेंगे। मोदी जी ने यह काम पहले गुजरात में कर दिखाया था और अब प्रधानमंत्री बनकर पूरे देश में कर रहे है। वाजिब मुआवजे का अधिकार और भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास में पारदर्शिता (संशोधन) अध्यादेश-2014’  उनकी ऐसी ही एक कोशिश है।

ख़ैर जहाँ शोषण है, दमन है वहाँ प्रतिरोध भी अवश्य होता है। बड़े से बड़ा दमनकारी भी इस हकीकत को नहीं बदल सकते। काले कानून, जेल, बम, गोलियों की बौछार भी जनप्रतिरोध को खत्म नहीं कर सकती। इसका ताज़ा उदाहर झारखण्ड की धरती पर दिखने लगा है। एक तरफ जहाँ पत्थलगढ़ी परंपरा ने आन्दोलन का रूप ले लिया है तो वहीँ दूसरी तरफ झारखण्ड आन्दोलन के अगुवा झारखण्ड मुक्ति मोर्चा एवं प्रदेश की तमाम विपक्षी दल ने जनता को साथ लेकर भूमि अधिग्रहण संशोधन अधिनियम के विरोध में  बिगुल फूंक दिया है। मोदी सरकार व उसके कंप्यूटर कीबोर्ड के ‘इंटर’ माने जाने वाले रघुवर दास द्वारा जनता-किसानों की जमीनें छीनने की नीति भी बेरोकटोक आगे नहीं बढ़ेनेवाली और न ही बढ़नी चाहिए। साथ ही इसी प्रकार जनता को सरकार के इस गैरजनवादी हमले के खिलाफ डटकर लड़ाई जारी रखनी होगी।

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