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झारखण्ड में अपने आदिवासी नेताओं को क्यों दरकिनार कर रही हैं भाजपा ?

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झारखण्ड में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का एक दिवसीय दौरा लगता है सफल नहीं रहा। और अब यह भी प्रतीत होने लगा है कि भाजपा की झारखण्ड राज्य-संगठन इकाई में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। आपस में ही इनमें बिगाड़ के कई लक्षण दिखने लगे है क्यूंकि अभी से ही भाजपा में अनुभवी, सीनियर एवं आदिवासी नेताओं की अनदेखी का संस्कार घर कर लिया है, जिससे रोज ही नए विवादों का जन्म हो रहा है। वैसे भी इस दल में सीनियर नेताओं को दरकिनार करने का संस्कार पहले से देखा जाता रहा है जिसके उदाहरण आडवानी जी, जोशी जी, शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा आदि सरीखे नेतागण हैं।

सूत्रों की माने तो, इसके ताजा उदाहरण यह है कि प्रदेश के पूर्व मुख्मंत्री अर्जुन मुंडा जी ने भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के आगमन पर व्यक्तिगत तौर पर प्रदेश की स्थिति पर चर्चा हेतु अल्प समय की मांग की थी। उनके नजदीकियों का (नाम न बताने के शर्त पर) कहना है कि उनके इस आग्रह को सुनना तो दूर, गौर करना भी गंवारा नहीं समझा गया और दिखावटी ढोल पीटवाने के लिए उन्हें साथ-साथ लिए घूमते रहे। साथ ही वे दावा भी करते हैं कि भाजपा का आदिवासियों के साथ राजनीतिक रिश्ता विल्कुल भी ठीक नहीं है और भाजपा के इस रवैये से मुंडा जी दुखी भी है। विडम्बना है कि वे अपनी भड़ास प्रकट भी नहीं कर सकते।

दूसरा नया विवाद प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा के खेमे से आ रही है। दरअसल, अमित शाह जब रांची से पटना के लिए रवाना हुए तो उनको विदाई देने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा नहीं पहुंचे। उनसे मिलन से पहले फोन स्विच ऑफ कर गिलुवा जी चाईबासा वापस चले गए। हालांकि इस विषय पर प्रदेश भाजपा के शीर्ष स्तर पर पूरे दिन चर्चा होती रही और राज्य में अमित शाह के कार्यक्रम को तय करने वाले नेतागण आपस में एक दूसरे से अपनी सफाई के साथ-साथ एक दूसरे पर दोषारोपण भी करते दिखे। चाहे जो भी हो पर संकेत तो यही मिल रहे हैं कि यहां सबकुछ ठीक नहीं चल रहा और आदिवासी नेताओं की अनदेखी तो निश्चित तौर पर हो रही है, जो आदिवासी समाज को मर्माहत कर रही है।

यह भी कहा जा रहा है कि अमित शाह के कार्यक्रमों में गिलुवा को अहमियत न दिए जाने से वे नाराज एवं दुखी हैं। उनको दरकिनार वाली बात को हवा तब और मिलती दिखती है जब अमित शाह की अपने सहयोगी दल आजसू अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो से मुलाकात के दौरान भी मुख्यमंत्री रघुवर दास और अन्य नेतागण तो साथ थे, पर लक्ष्मण गिलुवा नदारद दिखे। तय कार्यक्रम के अनुसार अमित शाह को आगमनौप्रांत पहले प्रदेश कार्यालय में विस्तारकों की बैठक में शामिल होना था। परन्तु वह रांची विलंब पहुंचे और फिर सीधे जनजातीय संवाद कार्यक्रम को प्रस्थान कर गए। लेकिन इस बाबत गिलुवा जी को आयोजकों ने समय से सूचना ही नहीं दी। जब गिलुवा को इसकी जानकारी हुई तो वे बाद में जनजातीय संवाद कार्यक्रम में पहुंचे, तबतक कार्यक्रम शुरू हो चुका था। गिलुवा को इससे काफी दुःख हुआ। उन्होंने आयोजकों से कहा भी कि प्रदेश अध्यक्ष को ही सही सूचना नहीं दी जा रही है। गुस्सा उनका जायज भी है क्योंकि यह कार्यक्रम आदिवासियों के हित के लिए प्रायोजित किया गया था और उनके नेता को ही इसकी सूचना नहीं मिली थी।

सूत्रों की माने तो गिलुवा जी की नाराजगी की कई वजहों में से एक यह भी रही कि प्रोटोकॉल के अंतर्गत प्रदेश अध्यक्ष ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ व गाड़ी में बैठ सकते हैं और यही परंपरा भी रही है, परन्तु यहाँ ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। साथ ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यक्रमों को तय करने में गिलुवा जी को अहमियत ही नहीं दी गयी। यही वजह थी रात स्टेट गेस्ट हाउस में कोर कमेटी और चुनाव प्रबंधन समिति की बैठक के बाद वे वहां से निकले और सीधा चाईबासा चले गए। जबकि स्टेट गेस्ट हाउस में यह आभास भी हुआ था जब पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि आज पार्टी की कौन-कौन सी बैठके हैं, तो उन्होंने अचंभित हो कहा था कि क्या आपलोगों को इसकी सूचना नहीं दी गई है। सूचना तो यह भी है कि चाईबासा पहुँच लक्ष्मण गिलुवा जी ने फोन तो ऑन किया लेकिन किसी का कॉल रिसीव ही नहीं किया। इस मामले पर प्रदेश पदाधिकारियों ने भी चुप्पी साध ली है। प्रदेश महासचिव सह विधायक अनंत ओझा ने फटी चादर ढकने के विफल प्रयास कर कहा कि उनके घर में अनुष्ठान था इसलिए वे चले गए। इसमें नाराजगी की कोई बात नहीं है।

बहरहाल, भाजपा हर-हाल में ही कॉर्पोरेट को खुश रखना चाहती है। चाहे इसके लिए उसे जो भी करना पड़े वह करेगी। अब आप ही बताइये इस प्रदेश में ज़मीन अधिग्रहण मुद्दा गरमाया हुआ है। भूमि अधिग्रहण संशोधित कानून लाकर सरकार आदिवासियों की ज़मीने औने-पौने दामों में चहेते उद्योगपति घरानों को लुटा रही है। इस बीच भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का झारखण्ड में आगमन होता है। उनके लिए जनजातीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है पर जनजातियों के प्रमुख नेता लक्ष्मण गिलुवा को इसकी सूचना नहीं दी जाती है दूसरे आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा जो प्रदेश की स्थितियों पर चर्चा करना चाहते थे उनको समय तक नहीं दिया गया। गौर करने पर पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है। इसके पीछे मंशा तो यही दिखती है कि अमित शाह अपने और उद्योगपतियों के बीच किसी भी रोड़े को बर्दाश्त नहीं करना चाहते हैं।

 

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