Breaking News
Home / News / Editorial / क्या जनता के अधिकारों का हनन ही विकास है?

क्या जनता के अधिकारों का हनन ही विकास है?

Spread the love

 

भाजपा सरकार के मंत्री एवं उसकी गोदी मीडिया लगातार देश के बढ़ते विकास की ढोल पीटते रहती है। जबकि कई दफा इनके फर्जी आँकड़ों की पोल खुल चुकी है और प्रकाशित विभिन्न रिपोर्टों से यह लगातार पता चल रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट के भंवर में फंसी है। नये रोज़गार पैदा होने की बात छोड़िये, पहले से मौजूद नियमित रोज़गार में भी लगातार कटौतियाँ जारी है। महँगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी थी परन्तु अब तो जीना दूभर कर दिया है। कृषि पर संकट का सबसे बुरा असर ग्रामीण मज़दूर एवं ग़रीब किसानों पर हुआ है तो वहीँ शहरी ग़रीब व मध्यमवर्गीय का तो बमुश्किल ही गुज़ारा हो रहा है।

लेकिन, इन संकटों के कीचड़ में भी अमीरों के कमल लगातार खिलते देखे जा रहे हैं। केवल पिछले वर्ष ही देश भर में 17 नये ”खरबपतियों” का जन्म हुआ और इसके साथ ही भारत में खरबपतियों की संख्या 101 तक पहुँच गयी। ऑक्सफ़ैम की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष देश में पैदा हुई कुल सम्पदा का 73 प्रतिशत, 1 प्रतिशत अमीर लोगों की मुट्ठी में चली गयी। इस एक प्रतिशत समूह की सम्पत्ति में पिछले वर्ष के दौरान 20.9 लाख करोड़ रुपये की जबरदस्त बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी जो कि 2017 के केन्द्रीय बजट के कुल अनुमान ख़र्च के लगभग बराबर है। वहीँ दूसरी तरफ, देश के 67 करोड़ ग़रीब आबादी की सम्पदा सिर्फ़ एक प्रतिशत बढ़ी।

आमदनी में असमानता की हद का अनुमान सिर्फ़ इस उदाहरण से लगाया जा सकता है कि यहाँ के किसी बड़ी गारमेण्ट कम्पनी के किसी ऊपरी अधिकारी की एक साल की कमाई ग्रामीण भारत में न्यूनतम मज़दूरी पाने वाले एक मज़दूर की 941 साल तक की मजदूरी के बराबर है। तो वहीँ उस मज़दूर के 50 वर्ष की मजदूरी के बराबर कमाई गारमेण्ट कंपनी के उस शीर्षस्थ अधिकारी को कमाने में मात्र साढ़े सत्रह दिन लगेंगे।

भारत में इस बढ़ती असमानता को समझने के लिए पहले के कुछ आँकड़ों पर नज़र डालते हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री लुकास चांसल और थॉमस पिकेट्टी की इसी वर्ष के रिपोर्ट में बताया गया कि 1980 के दशक में जिन नवउदारवादी आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई थी उसके पिछले तीन दशकों के दौरान परिणाम के रूप में यह देखा गया कि नीचे के 50% लोगों की आमदनी में मात्र 89% की वृद्धि हुई यानी इसे दोगुनी भी नहीं कहा जा सकता। इसके ऊपर के मँझले वर्ग 40% आबादी की आमदनी में 93% की वृद्धि हुई। जबकि शीर्ष के 10% आबादी की आमदनी में 394% बढ़त हुई, मतलब 5 गुना। अगर सबसे ऊपर के 1% की आबादी को देखें तो इनकी आय में 750% का इजाफ़ा हुआ अर्थात साढ़े आठ गुना। इसके ऊपर दसवाँ हिस्सा यानी सिर्फ 13 लाख की सँख्या की आमदनी देखें तो साढ़े 12 गुना बढ़ोतरी हुई। अगर ऊपर के सवा लाख को लें तो पाते हैं कि इनकी आय में 19 गुना बढ़ोतरी हो गयी और सबसे ऊपर के हज़ार-डेढ़ हज़ार अमीरों आमदनी देखें तो वृद्धि 28 गुना हो जाती है।

इन अध्ययनों के नतीजे उन ख़बरों को मजबूत करती हैं जिसमें बताया गया है कि भारत दुनिया में सबसे अधिक असमानता वाले देशों में से है, मतलब यहाँ के अमीर और गरीब के सम्पत्ति और आय के बीच का अन्तर बहुत बड़ी है। क्रेडिट सुइस की रिपोर्ट में बताया गया था कि 2016 में देश की कुल सम्पदा के 81% का मालिक मात्र 10% अमीर है। इसमें से भी अगर शीर्ष के 1% को लें तो उनके पास देश की कुल सम्पदा का 58% हिस्सा है। वहीं नीचे की आधी अर्थात 50% जनसँख्या की बात करें तो उसके  पास कुल सम्पदा का मात्र 2% ही है अर्थात कुछ भी नहीं। इनमें अगर सबसे नीचे के 10% की बात करें तो वे सम्पदा के मामले में नकारात्मक हैं अर्थात संपत्ति तो छोड़िये, सिर पर कर्ज़ का बोझा है।

इसी तरह बीच के 40% लोगों को देखें तो उनके पास कुल सम्पदा का मात्र 17% है। यहीं इस बात को भी समझ लेना जरूरी है कि यह असमानता पिछले वर्षों में बहुत तेज़ी से बढ़ी है। सिर्फ 6 वर्ष पहले 2010 में ऊपरी 1% तबके का कुल सम्पदा में हिस्सा मात्र 40% था। यानी सिर्फ़ 6 साल के दौरान सम्पत्ति में इनका हिस्सा 18% बढ़ गया। सवाल है कि यह हुआ कैसे? यह नीचे के 90% की सम्पत्ति में से आया है। जबकि पेड अर्थशास्त्री यह दावा करते रहे हैं कि ऊपर से धन सम्पदा रिसकर नीचे आती है जिससे ग़रीब लोगों के जीवन में सुधार आता है। मगर इन आर्थिक ”सुधारों” की सच्चाई यही है कि 90% जनता की सम्पत्ति और आय उनसे छीनकर उसे ऊपर के 10% शासक वर्ग की तिजोरियों में पहुँचाया जा रहा है।

इसी का नतीजा है कि तमाम लुभावनी स्कीमों एवं मनभावन नारों के बीच भी भाजपा सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं है जो हमारे मुल्क की बहुसंख्यक आबादी के जीवन में कोई सुधार ला सके। यह सरकार निहायत बेशर्मी से पूँजीपति घरानों को तमाम तरह के फ़ायदे पहुँचाने के लिए काम करती रहेगी और गरीब जनता के बीच पनपने वाले असन्तोष को थमने के लिए, हिन्दू-मुस्लिम, गाय-गोबर के नाम पर आपस में बाँटती-लड़ाती रहेगी। यह सरकार आतंकवाद-माओवाद-पाकिस्तान का हौआ देश में खड़ा करेगी ताकि लोग अपने जीवन पर मँडराते सबसे भयावह ख़तरों को न देख सकें, अपनी वास्तविक समस्याओं पर लड़ने के लिए एकजुट न हो सकें और आपस में ही कटते-मरते रहें। इन मंसूबों को लोगों के सामने उजागर करना और अपने वाजिब हक़ माँगने के लिए उन्हें एकजुट और संगठित करना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गयी है।

Check Also

झा -खंड

झारखंड बना “झा” खंड  -रामदेव विश्वबंधु (सामजिक कार्यकर्ता सह चिन्तक)

Spread the loveभाजपा ने झारखंड को “झा” खंड बना दिया  एक लम्बे संघर्ष व शहादत …

आदिवासी समाज और टीएसपी

आदिवासी समाज को गुरूजी जैसे सशक्त आवाज की जरूरत क्यों

Spread the loveआदिवासी समाज के संगठनों के अथक प्रयास के बल पर ही अनुसूचित जनजातीय …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.