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भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ रघुवर दास का पुतला दहन

भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ महा आन्दोलन का आगाज!

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किसानों एवं विपक्ष के गुस्से और भारी विरोध के बावजूद आखिरकार रघुवर सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बिल पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर मंजूरी दे ही दी। इस विधेयक को कानून में तब्दील होने के लिए अब मात्र इसे कुछ औपचारिकताओं से ही गुजरना है। इस विधेयक का कानून बनने के बाद झारखंड सरकार अब परियोजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण आसानी से करेगी। केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार ने ग्राम सभा को दरकिनार करते हुए संदेहास्पद तरीके से पहले खुद ही (कृषि मंत्रालय) आपत्ती जताई और बाद में नाम मात्र का संशोधन कर चुपके से इसे पास कर दिया।

जब देश में पहले से ही 2013 का केंद्र सरकार द्वारा बनाया कानून मौजूद है तब फिर झारखंड सरकार को भूमि अर्जन, पुनर्वास में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार झारखंड संशोधन विधेयक 2017 लाने की आखिर जरूरत क्यों पड़ी? झारखंडी जनता एवं सम्पूर्ण विपक्ष के विरोध के बाद भी इसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजने का सिर्फ एक ही वजह हो सकता है – पूंजीपतियों या कॉर्पोरेट घरानों का दबाव। इस विधेयक में भूमि वापसी का कोई प्रावधान नहीं है। जी हाँ, जमीन अधिग्रहण की सरकारी घोषणा के बाद चाहे उस भूमि पर काम शुरू हो या न हो, वह जमीन सरकार की ही हो जाएगी।

सरकार की योजनाओं के लिए भूमि-अधिग्रहण हो जाने के उपरान्त इसपर किसी प्रकार का सामाजिक प्रभाव का आंकलन नहीं होगा। ग्रामसभा का अधिकार सिर्फ अधिग्रहण संबंधी परामर्श देना ही रह जाएगा। इसलिए सामाजिक संस्थान, झारखंडी जनता एवं विपक्ष को इसे काला कानून कहना पड़ रहा है। और इसके विरोध के पीछे यही एक बड़ी वजह भी है।

झारखण्ड के नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन एवं दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने राष्ट्रपति से मिल कर हस्ताक्षर ना करने हेतु ज्ञापन भी सौंपा था, इसे भी अनसुना कर दिया गया। जबकि देखा जाय तो झारखण्ड आन्दोलन के अगुवा सिपाही शिबू के अनुभवों को भी अनदेखा किया गया।    

इस विधयेक को लेकर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष हेमन्त सोरेन ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने रघुवर सरकार को इस विधेयक के प्रति अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया था। परन्तु इस विषय पर सरकार का कोई सकारात्मक पहल नहीं दिखने के कारण झारखण्ड में एक बड़े आन्दोलन की पृष्ठभूमि स्वतः तैयार हो गयी।  

हेमंत सोरेन के आवास पर 18 जून को संपूर्ण विपक्षी दलों के साथ-साथ कई सामाजिक संगठनों का सामूहिक मैराथन बैठक हुई जिसमें हेमंत सोरेन को कोऑर्डिनेशन कमेटी का अध्यक्ष चुना गया और इस विधेयक के खिलाफ जोरदार 6 दिवसीय महा-आंदोलन का शंखनाद भी किए। जो इस प्रकार है:-

इस आन्दोलन का आगाज वे 19 जून को राज्य भर में सरकार का पुतला दहन कर किए। इसके बाद वे 21 जून को राज्य में प्रखंड स्तर पर धरना प्रदर्शन करेंगे। 25 जून को पूरे झारखण्ड प्रदेश के प्रत्येक जिलों में जिला स्तरीय धरना प्रदर्शन का कार्यक्रम होगा। इसके पश्चात 28 जून को भारी जन समर्थन के साथ झारखण्ड राज्यभवन के समक्ष राज्यस्तरीय महा-धरना दिया जाएगा। इसी के अंतर्गत पूरे झारखंड में जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिये 30 जून, हूल दिवस को संकल्प दिवस के रूप में मनाया जायेगा। फिर 5 जुलाई यानि राज्यव्यापी महाबंदी का दिन मुकर्रर किया गया है।

अब देखना यह है कि झारखण्ड की इस पूंजीपतियों की रघुवर सरकार और गोदी मीडिया से यहाँ की मासूम जनता किस प्रकार निबटती है|

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