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वज्रपात का झारखण्ड में भयावह रूप

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आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि इन दिनों झारखण्ड में भाजयुमो नामक नया तूफ़ान रांची के सड़कों पर हुडदंग  मचाते देखा गया है। आप सभी झारखण्डवासियों को पहले से ही आगाह किया जाता है कृपया इस तूफ़ान से बचकर रहें क्योंकि यह तूफ़ान समाज में व्याप्त भाई-चारे को ख़त्म करने का प्रयास करता है और सांप्रदायिक दंगों का कारण भी बनता है।

रांची मेन रोड, डेलीमार्केट चौक के पास भाजपा युवा मोर्चा के नेताओं पर नारेबाजी के साथ मारपीट का आरोप लग रहा है। ईद के महीने में यहाँ खरीदारी के लिए काफी संख्या में लोग पहुचते हैं। रोजा खोलने के वक़्त में जुलुस लिकालना इस सरकार को कहाँ तक शोभा देता है। लोगों की माने तो  दूकानदारों के साथ मारपीट भी  हुई है । इस कारण इलाके में भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गयी। आसपास के दुकान संचालक दुकानें बंद कर भागने लगे। कुछ दुकानदार शटर बंद कर दुकान के अंदर ही छिप गये।  घटना  स्थल पर प्रशासन तैनाती  के बाद ही कई ग्रहक एवं दूकानदार  अपने घरों  जा सके। 

स्थानीय लोगों ने रैली में शामिल लोगों पर जानबूझ कर मारपीट करने और तनाव फैलाने का आरोप लगा रहे हैं।

प्रकृति को जि़म्मेदार ठहराकर यह व्यवस्था अपने निकम्मेपन का प्रदर्शन करती है

झारखंड एक पठारी प्रदेश है, इसके वजह से यहां वज्रपात का कुछ अधिक असर होता है। राज्य में वज्रपात (ठनका) से हर साल औसतन 200 लोगों की असमय मृत्यु हो जाती हैं। 
इस वर्ष अबतक मई महीने पहली दिन से लेकर जून की आठवें दिन तक लगभग 84 से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं औए इस आंकड़े के दोगुने झुलस गए हैं। यह वे आंकड़ें हैं, जिसकी रिपोर्टिंग हो पायी है। रिपोर्टिंग नहीं होनेवाली घटनाओं का भी योग हो तो मृतकों की संख्या कहीं ज्यादा हो जाएगी। 
सर्वेक्षण के तहत, वज्रपात से सर्वाधिक प्रभावित जिलों की श्रेणी (लेवल-1) की सूचि में राज्य के 24 में 15 जिले आते हैं। शामिल जिले – रांची, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम के अलावा सरायकेला खरसावां, रामगढ़, खूंटी, चतरा, लातेहार, कोडरमा, हजारीबाग, दुमका और देवघर हैं। बाकी नौ जिले लेवल-2 की सूचि में आते हैं इस वज़ह से यहाँ वज्रपात का असर अपेक्षा से कम होता है।

वैसे तो अब हर साल के मई महीने में देश के विभिन्न क्षेत्रों में धूल भरी आँधी, तूफ़ान, बिजली गिरने और ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक परिघटनाएँ निश्चित ही देखने को मिलती हैं, लेकिन इस साल ये अपनी तीव्रता और भयावहता में इजाफा करते हुए कुछ अधिक ही तांडव मचा रहे हैं। 2 मई को आयी आँधी में झारखण्ड के अलावे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड, तेलंगाना में भी एक ही दिन में 134 लोगों की मौतें हो गयी और 400 से ज़्यादा लोग झुलस गये। झारखण्ड के समान्तर ही 80 से ज़्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में भी हुईं। उसके बाद 13 मई को आयी आँधी ने एक बार फिर तबाही ने पूरे देश में 60 लोग मारकर ही सांस लिया। अख़बारों और मीडिया चैनलों में इसकी कवरेज बहुत ही निराशाजनक रही। अधिकांश मीडिया समूहों ने बहुत कम कवरेज किया और जिहोनें कवरेज की भी उन्होंने इन आपदाओं के लिए क़ुदरत को ही जि़म्मेदार बताया। ऊपरी तौर पर देखने से ये आपदाएँ क़ुदरत का ही क़हर प्रतीत होता हैं जिसपर इंसान का कोई वश नहीं। पर जब हम इनकी तह में जाते हैं, तो पाते हैं कि मामला तो  कुछ और ही है।

पर्यावरणविद हमेशा ज़ोर देकर गुहार लगाते हैं कि आँधी, ठनका, तूफ़ान, सूखा, बाढ़ जैसी प्राकृतिक परिघटनाओं में तीव्रता और भयावहता की वृद्धि का जड़ सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन है। जलवायु परिवर्तन के लिए निसंदेह मुनाफ़े पर आधारित मौजूदा उत्पादन प्रणाली ही जि़म्मेदार है। अनियोजित औद्योगिक विकास और जंगलों की अन्धाधुँध कटाई से ही पारिस्थितिक असन्तुलन में लगातार इजाफा हो रहा है। फलस्वरूप हम प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता और बारम्बारता के बढ़ने के रूप में देखते है। मुनाफ़े की हवस में बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई और वैज्ञानिक पद्धति के कॉर्पोरेटिक (इनकी अपनी ही प्रणाली है) खेती-बाड़ी की वजह से मृदा क्षरण (भूमि-कटाव ) बहुत तेज़ी से होता है जो आँधी-तूफ़ान की भयावहता को कई गुना बढ़ा देता है। इसके अतिरिक्त शहरों में कूड़े-करकट का अम्बार खुले में ही फैला रहता है नतीजतन आँधी के साथ-साथ धूल और ज़हरीले कण फि़‍ज़ाओं में भी फैल जाते हैं।  

आँधी-तूफ़ान अपने आप में जानलेवा नहीं होते। आँधी-तूफ़ान में जान गँवाने वाले ज़्यादातर लोग किसी इमारत, घर या दीवार के ढहने से या फिर पेड़ के गिरने से मरते हैं। इस बार की आँधी में भी ज़्यादा मौतें उन लोगों की हुईं जिनके घर कच्चे थे। कुछ लोग बिजली के टूटे तार के करेण्ट से भी मरते हैं। बिजली गिरने से मरने वाले लोग भी ज़्यादातर इसलिए मरते हैं क्योंकि वे उस समय पानी भरे खेतों में काम कर रहे होते हैं। प्राकृतिक परि‍घटनाओं पर भले ही मनुष्य का नियन्त्रण न हो परन्तु उन परिस्थितियों पर निश्चय ही मनुष्य का नियन्त्रण है जो इन मौतों का प्रत्यक्ष कारण होती हैं। आज सिविल इंजीनियरिंग इतनी उन्नत हो चुकी है कि आँधी-तूफ़ान-बिजली‍ गिरने या भूकम्प आदि जैसे ख़तरों से दीवारों, घरों और इमारतों को सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया जाये तो निश्चीय ही ऐसी मौतों की सम्भावना को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। इसी तरह से अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद मौसम विज्ञान इतनी तरक़्क़ी तो कर ही चुका है कि आँधी-तूफ़ान-तेज़ बारिश का मोटा-मोटी पूर्वानुमान लगाया जा सके। संचार व्यवस्था भी इतनी उन्नत हो चुकी है कि ऐसे पूर्वानुमानों पर आधारित सूचनाएँ समाज के प्रत्येक सदस्य तक पहुँचाई जा सकती हैं, ताकि कोई भी ऐसे समय बाहर न निकले, जब कोई आपदा आने वाली हो।

लेकिन सोचने वाली बात है कि विज्ञान-प्रौद्योगिकी में इतनी उन्नति के बावजूद आज भी इतने सारे लोग आपदाओं की चपेट में क्यों आ जाते हैं? इस बार मौसम विभाग ने उत्तर भारत में भयंकर आँधी-तूफ़ान आने का अन्देशा जताया था। लेकिन फिर भी तमाम सरकारों ने जानमाल को होने वाले नुक़सान को रोकने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाये। उत्तर प्रदेश और झारखण्ड जहाँ सबसे ज़्यादा मौतें हुईं। क्योंकि एक तरफ जहाँ मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ तो आपदा प्रबन्धन की निगरानी करने की बजाय कर्नाटक के चुनाव प्रचार में मशगूल थे तो दूसरी तरफ झारखण्ड के रघुवार महाराज तो ऐसे छोटे-मोटे कामों पर ध्यान देना भी उच्चित नहीं समझते हैं! वैसे भी हमारे देश में आपदा प्रबन्धन इतना लचर है कि यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वह अपने आप में एक आपदा है। अगर मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के आधार पर लोगों को पहले से ही सतर्क करने के इन्तज़ाम किये जायें और आपदा आने के पहले से ही आपदा प्रबन्धन की मशीनरी सतर्क रहे तो आपदा से होने वाले नुक़सान को विचारणीय स्तर पर कम किया जा सकता है

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