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मार्क्स – क्रान्तिकारियों के शिक्षक और गुरु

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दुनियाभर के मजदूरों को मुक्ति की राह दिखाने वाले महान व्‍यक्तित्‍व कार्ल मार्क्‍स का आज 200वां जन्म दिन है। मज़दूर वर्ग के महान नेता और शिक्षक कार्ल मार्क्स के जन्मदिवस (5 मई) के अवसर पर:

मार्क्स के साथी और जर्मन मज़दूर आन्दोलन के एक प्रमुख नेता

“मूर” (दोस्तों के बीच मार्क्स का नाम) हम “तरुणों” से 5 या 6 साल ही बड़े थे, लेकिन हमारे सम्बन्ध में अपनी परिपक्वता की गुरुता का उन्हें पूरा एहसास था और हम लोगों की, ख़ासकर मेरी, जाँच के लिए हर अवसर से लाभ उठाते थे। उनके प्रकाण्ड अध्ययन तथा अद्भुत स्मरण-शक्ति के कारण हममें से कइयों को लोहे के चने चबाने पड़ते थे। हममें से किसी न किसी “विद्यार्थी” को कोई टेढ़ा प्रश्न देकर और उसके आधार पर हमारे विश्वविद्यालयों तथा हमारी वैज्ञानिक शिक्षा की पूर्ण निस्सारता सिद्ध करने में उन्हें मज़ा आता था।

 

लेकिन उन्होंने शिक्षा भी दी और उनकी शिक्षा योजनाबद्ध थी। उनके बारे में मैं संकुचित और व्यापक दोनों अर्थों में कह सकता हूँ कि वे मेरे गुरु थे और यह बात सभी क्षेत्रों पर लागू होती है। राजनीतिक अर्थशास्त्र की तो मैं बात ही नहीं करता, क्योंकि पोप के महल में पोप की बात नहीं की जाती। कम्युनिस्ट लीग में राजनीतिक अर्थशास्त्र पर उनके व्याख्यानों की बात मैं बाद में करूँगा। मार्क्स को प्राचीन और आधुनिक भाषाओं का बहुत अच्छा ज्ञान था। मैं भाषाविद् था और अरस्तु अथवा एस्कीलस का कोई ऐसा कठिन अंश मुझे दिखाने का अवसर पाकर उन्हें बच्चों जैसी ख़ुशी होती थी, जो मैं फ़ौरन नहीं समझ सकता था। उन्होंने एक दिन मुझे इसलिए बहुत बुरा-भला कहा कि मैं स्पेनी भाषा नहीं जानता था और मार्क्स किताबों के एक ढेर में से डॉन क्विक्ज़ोट निकालकर मुझे स्पेनी के सबक़ देने लगे। मैं दीत्स लिखित लातीनी भाषाओं के तुलनात्मक व्याकरण से स्पेनी के व्याकरण तथा शब्द-विन्यास के नियम जान चुका था, इसलिए “मूर” के उत्कृष्ट पथप्रदर्शन और मेरे रुकने या लड़खड़ाने की सूरत में उनकी सतर्क सहायता से काम काफ़ी ठीक ढंग से चलता रहा। वे, जो वैसे तो इतने उतावले थे, पढ़ाने में कितने धैर्यवान थे! मिलनेवाले किसी व्यक्ति के आ जाने पर ही सबक़ का अन्त होता था। जब तक उन्होंने मुझे पर्याप्त योग्यता सम्पन्न नहीं समझ लिया, तब तक मुझसे रोज़ सवाल पूछते रहे और मुझे डॉन क्विक्ज़ोट अथवा अन्य किसी स्पेनी पुस्तक के अंश का अनुवाद करना पड़ता था।

 

मार्क्स अद्भुत भाषाविद् थे, यद्यपि प्राचीन भाषाओं से अधिक आधुनिक भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्हें ग्रिम के जर्मन व्याकरण का अधिकतम अचूक ज्ञान था। वे ग्रिम-बन्धुओं के शब्दकोश को मुझ भाषाविद् की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह समझते थे। वे किसी अंग्रेज़ या फ़्रांसीसी की भाँति ही बढ़िया अंग्रेज़ी या फ़्रांसीसी लिख सकते थे यद्यपि उच्चारण इतना अच्छा नहीं था। न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून के लिए उनके लेख क्लासिकीय अंग्रेज़ी में और प्रूदों की ‘दरिद्रता का दर्शन’ के विरुद्ध उनकी कृति ‘दर्शन की दरिद्रता’ क्लासिकीय फ़्रांसीसी में लिखे गये थे। छपने से पहले यह दूसरी रचना उन्होंने जिस फ़्रांसीसी मित्र को दिखायी, उन्होंने उसमें बहुत ही कम काट-छाँट की।

 

 

चूँकि मार्क्स भाषा का मर्म समझते थे और उन्होंने उसके उद्गम, विकास तथा विन्यास का अध्ययन किया था, अतः उनके लिए भाषाएँ सीखना कठिन नहीं था। लन्दन में उन्होंने रूसी सीखी और क्रीमियाई युद्ध के दौरान तुर्की और अरबी सीखने का भी इरादा किया, लेकिन उसे पूरा नहीं कर सके। भाषा पर सचमुच अधिकार जमाने के आकांक्षी के अनुरूप ही, वे पठन को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते थे। अच्छी स्मरण-शक्ति रखनेवाला व्यक्ति – और मार्क्स की स्मरण- शक्ति इतनी अद्भुत थी कि उन्हें कभी कुछ नहीं भूलता था – शीघ्र ही शब्द-भण्डार और पदविन्यास संचित कर लेता है। उसके बाद व्यावहारिक इस्तेमाल आसानी से सीखा जा सकता है।

 

मार्क्स ने 1850 और 1851 में राजनीतिक अर्थशास्त्र पर क्रमबद्ध रूप से कई व्याख्यान दिए। वे इसके लिए राज़ी तो नहीं थे, लेकिन चूँकि अपने कुछ निकटतम मित्रों के बीच निजी तौर से चन्द व्याख्यान दे चुके थे, इसलिए हमारे अनुरोध पर अधिक विस्तृत श्रोताओं के सामने भाषण करने को भी तैयार हो गये। उस व्याख्यान-माला में, जिसे सुननेवाले सभी सौभाग्यशाली श्रोताओं को अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुआ, मार्क्स ने अपनी मतपद्धति के उसूलों को ठीक वैसे ही विकसित किया, जैसे पूँजी में उसका स्पष्टीकरण किया गया है। उस समय तक ग्रेट विण्डमिल स्ट्रीट पर ही स्थित कम्युनिस्ट शिक्षा-समिति के खचाखच भरे हॉल में, उसी हॉल में, जहाँ डेढ़ साल पहले कम्युनिस्ट घोषणापत्र स्वीकृत किया गया था, मार्क्स ने ज्ञान-प्रचार की उल्लेखनीय प्रतिभा प्रदर्शित की। वे विज्ञान के भ्रष्टीकरण, अर्थात् उसके मिथ्यापन, निकृष्टीकरण और जड़ीकरण, के अनन्य विरोधी थे। अपने विचारों को स्पष्टतः अभिव्यक्त करने में उनसे अधिक समर्थ कोई नहीं था। कथन की स्पष्टता चिन्तन की स्पष्टता का फल होती है और स्पष्ट विचार अनिवार्यतः स्पष्ट अभिव्यक्ति का कारण होते हैं।

 

एक दिन इस निपुणता पर जब मैंने आश्चर्य प्रकट किया, तब मुझे बताया गया कि मार्क्स ब्रसेल्स की जर्मन मज़दूर समिति में भी व्याख्यान दे चुके हैं। बहरहाल, उनमें श्रेष्ठ शिक्षक के सभी गुण मौजूद थे। शिक्षण में वे श्यामपट्ट का भी इस्तेमाल करते थे, जिस पर सूत्र लिख देते थे। उन सूत्रों में वे भी शामिल होते थे, जिन्हें हम सभी पूँजी के प्रारम्भिक पृष्ठों से ही जानते थे।

 

मार्क्स कठोर शिक्षक थे। वे केवल हमसे अध्ययन करने का तक़ाज़ा ही नहीं, बल्कि इस बात की जाँच भी करते थे कि हम सचमुच अध्ययन करते हैं।

 

मैं बहुत अर्से तक ब्रिटिश ट्रेड-यूनियनों के इतिहास का अध्ययन करता रहा। वे हर रोज़ मुझसे पूछते कि मैं कहाँ तक पहुँचा हूँ और जब तक मैंने एक बड़ी सभा में एक लम्बी वक्तृता नहीं दे डाली, उन्होंने मुझे चैन नहीं लेने दिया। वे सभा में मौजूद थे। उन्होंने मेरी प्रशंसा नहीं की, लेकिन कड़ी आलोचना भी नहीं की। चूँकि प्रशंसा करने की उनकी आदत नहीं थी और करते भी थे तो केवल दया भाव से, इसलिए उनकी प्रशंसा के अभाव पर मैंने अपने मन को तसल्ली दे ली। फिर जब वे मेरी एक प्रस्थापना पर मुझसे बहस में उलझ गये, तो मैंने उसे अप्रत्यक्ष प्रशंसा ही समझा।

 

मार्क्स में शिक्षक का एक विरल गुण था: वे कठोर होते हुए भी हतोत्साहित नहीं करते थे। उनका दूसरा, उल्लेखनीय गुण यह था कि वे हमें आत्मालोचना के लिए बाध्य करते थे और हमारी उपलब्धियों से हमें आत्मतुष्ट नहीं होने देते थे। वे सारहीन चिन्तन पर अपनी व्यंगोक्तियों के निर्मम चाबुक बरसाते थे।

 

जर्मन मज़दूर समिति – मज़दूरों के बीच राजनीतिक तथा वैज्ञानिक कम्युनिज़्म के विचारों के प्रचार के हेतु अगस्त 1847 में मार्क्स और एंगेल्स द्वारा ब्रसेल्स में स्थापित की गयी। फ़्रांस में 1848 की बुर्जुआ फ़रवरी क्रान्ति के शीघ्र ही बाद इसका अस्तित्व समाप्त हो गया।

विल्हेल्म वाइटलिंग (1808-1871) – काल्पनिक समतावादी कम्युनिज़्म के एक सिद्धान्तकार।

 

एत्येन काबे (1788-1856) – काल्पनिक कम्युनिज़्म के विख्यात प्रतिनिधि, अमेरिका में कम्युनिस्ट बस्ती के संस्थापक।

 

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