आदिवासी दर्शन की जरुरत आज समाज को क्यों?

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आदिवासी दर्शन

आदिवासी दर्शन की समाज में अहमियत

कैसे बांची प्राण… है? यह सवाल आदिवासी समुदाय का देश से है,  विकास की जिस धारा को शहर से गांव पहुंचाने की बात सरकार से लेकर पंचायत तक के नेता करते रहे, उसके अक्स तले आदिवासी केवल अपनी झोपड़ी को बचाने में ही असली सुकून मानते हैं। मुश्किल तो यही हो चला कि जंगल में बसे इनके गाँव की दूरी दिल्ली से हज़ार मील से भी कम है, लेकिन इनके विकास के दर्द की लकीर की दूरी सदियों से दिल्ली तक नहीं पहुँची है।

झारखंड के आड्रे हाउस में ‘आदिवासी दर्शन’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उदघाटन सत्र में, राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने समुदाय के इसी दर्द को मंच से रखा। क्या मजेदार बात है कि जिस आदिवासी समुदाय की आबादी दुनिया की कुल आबादी का पांच प्रतिशत हो, उसकी दुनिया की गरीबी में हिस्सेदारी 15 प्रतिशत है। इसे विडंबना कहा जाए या दिल्ली के दिल में यह समुदाय नहीं बसता, आप जो चाहे समझ ले, लेकिन दिल्ली के नियत पर सवाल से इनकार नहीं कर सकते! 

खनिज सम्पदा लूट ने कई आदिवासी समूहों को उनके जमीन जायदाद से बेदखल किया, जिसकी परिकल्पना सरकार ने निस्संदेह नहीं की होगी। लेकिन यह भी सच है कि जिस झारखंड में 1951 तक 30-35 प्रतिशत आदिवासी आबादी बसते थे वहां आज वे महज 26 प्रतिशत ही बचे हैं,  जो अपने आप में गंभीर के साथ ही अति चिंतनीय विषय है। सेमिनार का मकसद गहन मंथन कर विस्तृत जानकारी जुटाना होना चाहिए।

मसलन, मुख्यमंत्री जी का कहना कि हम इनके ज़मीनों पर सड़क, बिल्डिंग व उद्योग-कारखाने तो लगाए, लेकिन उन ग़रीब आदिवासियों को इस विकास के आधुनिक मॉडल की ग्लोबल भूख ने उत्थान के जगह ग्रास बना लिया। प्राकृतिक संतुलन में अहम् भूमिका निभाने वाले समुदाय की पहचान प्राकृतिक सौंदर्य के अक्स से मिट गया है। राज्यपाल महोदया का कहना कि मौखिक परंपरा पर आधारित  इस समुदाय का दस्तावेजीकरण न हो पाने के दृष्टिकोण से भी ‘आदिवासी दर्शन’ को अहमियत देना जरुरी है, सत्य है। 

जाहिर है कि इनकी दुर्भाग्य की फ़ेहरिस्त इतनी लंबी व दर्दनाक है कि किसी को भी अंदर से हिला दे। क्योंकि यह ना तो 84 के सिख दंगो या 2002 के गुजरात दंगो की तरह राजनीतिक मुद्दा बन सका है और ना ही इनकी त्रासदी को जानने के लिये अबतक कोई शब्द ही रचे गये हैं।

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