सुरक्षा किट मांगने वाले एम्स के डाक्टरों को धमकी, पीएम से लगायी गुहार

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यक़ीन करना मुश्किल है लेकिन यह उसी दौर में हो रहा है जब डाक्टरों और नर्सों की सेवा भावना की तारीफ़ करने के पीएम मोदी के आह्वान पर देश भर ने पांच अप्रैल को घरों से निकलकर ताली और घंटा घड़ियाल बजाया था. उन्हीं डाक्टरों की शिकायत पर उनके ख़िलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दीजा रही है। और ये सब हुआ देश के सबसे प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल संस्थान एम्स में। एम्स के रेजीडेंट्स डाक्टर्स एसोसिएशन ने इस सिलसिले में पी.एम.मोदी को चिट्ठी लिखकर उत्पीड़न से बचाने की गुहार की है।

चिट्ठी में कहा गया है कि कोरोना के इस संकट काल में डाक्टरों और नर्सों की सराहना के बजाय उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है। ये सरकार की जिम्मेदारी है कि डाक्टरों को सुना जाये, न कि उन्हें बेइज्जत किया जाये। पीएम को संबोधित करते हुए लिखा गया है कि “एक एक्टिव सोशल मीडिया यूजर होने के नाते आप शायद डाक्टरों की मन:स्थिति समझ रहे होंगे। डाक्टर भी कोरोना संक्रमण से अछूते नहीं हैं।”

दरअस्ल, डाक्टरों पर आरोप है कि उन्होने एम्स में पीपीई या व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की शिकायत सोशल मीडिया में दर्ज करायी। उन्हें लिखा कि बिना पीपीई के उन्हें कोविड-19 की जांच में दिक्कत आ रही है। यही नहीं, उन्होंने पीएम केयर में जबरी डोनेशन का भी विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि इस पैसे का पीपीई खरीदने से लेकर तमाम एम्स की परेशानियों को दूर करने में होना चाहिए न कि कहीं दे देना चाहिए।

लेकिन प्रशासन को यह पसंद नहीं आया और कई डाक्टरों को नोटिस जारी कर दिया गया। 

वैसे, एम्स के डाक्टरों का सोशल मीडिया में हकीकत बयान करना मजबूरी थी। सच्चाई यह है कि एम्स के भी कुछ डाक्टर कोरोना की चपेट में आ चुके हैं जिससे पीपीई का मुद्दा बेहद गंभीर हो चुका है। इसी मुद्दे पर दिल्ली के बाड़ा हिंदूराव अस्पताल के डाक्टर और नर्स इस्तीफे की पेशकश करके हड़कंप मचा चुके हैं।

वैसे, यह केवल दिल्ली का मसला नहीं है। देशभर में अबतक 50 से अधिक डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं. ज्यादातर जगहों पर पीपीई की कमी है जबकि जो डाक्टर या नर्स इसके बगैर मरीजों तक जाते हैं, उन्हें भी संक्रमण का खतरा होता है। पिछले दिनों इसे लेकर कुछ शर्मिंदा करने वाली खबरें आयी थीं मसलन कोलकाता में डाक्टर फटी बरसाती पहनने को मजबूर थे तो मास्क के अभाव में हरियाण के एक डाक्टर को हैलमेट पहनकर काम चलाना पड़ा था.

सवाल ये है कि पीएम के आह्वान पर जनता ने ताली-थाली, शंख और घंटा तो बजा लिया, लेकिन कोरोना की सेहत पर इससे क्या फर्क पड़ा। वह तो दिनो दिन बढ़ता ही जा रहा है। अगर डाक्टर ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो मरीज का इलाज कैसे होगा।

कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा घंटा घड़ियाल इसीलिए बजवाया जा रहा है कि डाक्टरों का दर्द किसी को सुनायी न दे?

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